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मंगलवार, 24 जुलाई 2018

ख़ता !

कुछ ख़ताएँ न की तो फ़िर मज़ा क्या है,
फ़रिश्ता होने में इतना भी नफ़ा क्या है !

मामला दिल का है तो फ़र्क़ पड़ता क्या है,
कि सही-ग़लत और भला-बुरा क्या है !

तेरी बाहों से जो मुझे रिहा कर दे,
ऐसी आज़ादी में भला नफ़ा क्या है !

तेरी जफ़ा को भी सलीक़े से बयां करता हूँ,
वफ़ा-दारी की इससे बेहतर सज़ा क्या है !

याद कर करके तुझको मैं ये सोचता हूँ,
कि तुझे भूल जाने का तरीका क्या है !

तेरी याद को मेरे दिल से भुला न सके,
उस मयकदे में 'फ़राज़' नशा क्या है !

ख़ता= Fault, Mistake
फ़रिश्ता= Angel
नफ़ा= Profit
मामला= Matter
फ़र्क़= Difference
रिहा= Release
जफ़ा= Injustice, The Tyranny Of Beloved
सलीक़ा= Good Manners, Discreet Of Good Disposition
बयां= Statement, Declaration, Description, Assertion
वफ़ा-दारी= Constancy, Fidelity
बेहतर= Better
सज़ा= Punishment
मयकदा= Bar, Tavern.

रविवार, 9 अप्रैल 2017

तू न आया !!!

कोई आदाब-ए-वफ़ा न कभी निभाने आया,
तू जब आया तो फ़िर से छोड़ जाने आया !

जब तू आया तो एक नया ज़ख्म दिया,
कोई मरहम कभी तू न लगाने आया !

ये वक़्त-ए–आख़िर मेरा, और कंधे ग़ैरों के,
रस्म-ए-आख़िर भी न तू निभाने आया !

बहुत नाज़ था हमको वफ़ादारियों पर,
आज हम रूठे तो तू न मनाने आया !

||| फ़राज़ |||