मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

दुश्वारी!!!

क्या अजब चाहत थी, क्या ग़ज़ब दुश्वारी थी,
घर मेरा मिट्टी का था, बरसात से मेरी यारी थी !
तूफ़ान को भी ख़ुदारा क्यूँ आज ही आना था,
आज ही तो मैंने कश्ती लहरों में उतारी थी !

जब आँख खुली मेरी तो ये इल्म हुआ मुझको
मदहोशी जिसको समझा, वो तो बस ख़ुमारी थी !
न मैंने ही आवाज़ दी, न तुमने मुड़कर देखा,
तुमको भी था ग़ुरूर, मेरी भी कुछ ख़ुद्दारी थी !

जिसकी आतिश में जलकर हम ख़ाक हो गए,
बुझकर भी न बुझ सकी, जाने कैसी चिंगारी थी ! 
'फ़राज़' तेरे इश्क़ को तो नाकाम होना ही था,
तू सुखन का ताजिर था, उसकी नौकरी सरकारी थी !

|||फ़राज़|||

दुश्वारी= Difficulty.
ख़ुदारा= Oh God.
इल्म=Knowledge, Learning.
मदहोशी= Intoxication.
ख़ुमारी= Hangover
ग़ुरूर= Proud
ख़ुद्दारी= Self-respect
आतिश= Fire, Flame
ख़ाक= Dust, Ashes, Worthless.
चिंगारी= Spark, Scintilla.
नाकाम=Unsuccessful, Failure.
सुखन= Speech, Language, Words,
ताजिर= Trader.

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

इंतज़ार !!!

माना कि ये प्यार नहीं, कुछ और है,
दिल तेरा इंतज़ार फ़िर भी करता क्यूँ है !

दिल जानता है कि तेरी तलाश ख़सारे होंगे,
दिल तेरी गली से फ़िर भी गुज़रता क्यूँ है !

कभी चाँद ने देखा था वस्ल दो सितारों का,
मैं तो ग़र्दिश में हूँ मगर चाँद भटकता क्यूँ है !

तू तो छत पर सिर्फ़ मेरे लिए आता था,
तो अब भी चाँद रातों में निकलता क्यूँ है !

मेरे ज़िक्र पर वो अब भी चौंक जाता है,
ऐसा करता है, तो वो ऐसा करता क्यूँ है !

उसकी आँखों में अब कोई और बस गया है,
तू अभी तक उसके लिए संवारता क्यूँ है !

तू दिल्लगी ही कह देता इस रब्त को,
मोहब्बत को तू बदनाम करता क्यूँ है !

ज़हन को भी वो छू गया होगा 'फ़राज़',

हर इल्ज़ाम दिल पर ही धरता क्यूँ है !

|||फ़राज़|||


ख़सारे= Losses

वस्ल= Meeting, Union.
ग़र्दिश= Misfortune, Circulation, Rotation.
ज़िक्र= Narration, Remembrance, Talk.
रब्त= Connection, Relation, Bond, Intimacy.
ज़हन= Mind.
इल्ज़ाम= Blame

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

अशआर !!!

दर्द खरीदने आया हूँ फ़िर दिल के बदले,
आज गाहक फ़िर मैं तेरी दुकान का हूँ !

मैंने ही जुर्म किया था मोहब्बत करके,
मुस्ताहिक़ तो बस मैं ही सज़ा का हूँ !

तेरी कहानी में मेरा ज़िक्र तो आना ही था,
मुख़्तसर ही सही, क़िस्सा तेरी दास्ताँ का हूँ !

तुझको चाहा बहुत मगर  पूज सका,
शायर हूँ, न की मुन्किर मैं ख़ुदा का हूँ !

भटक के बहुत दूर निकल आया हूँ,
मुसाफ़िर तो मैं तेरे ही कारवां का हूँ !

जलता देखा है क्या कभी अपने घर को,
मुझसे सुनो, मुसलमान मैं बर्मा का हूँ !

अबकी आये तो कभी छोड़कर न जाए,
मुन्तज़िर मैं ऐसे किसी महमाँ का हूँ !

प्यार के लालच में ही फँस जाता हूँ,
यूँ तो पक्का मैं भी ईमान का हूँ !

उनकी आँखें मुझे देख के जगमगाती हैं,
सितारा मैं माँ बाप की निगाह का हूँ !

पहले तुम मेरे अशआर तो पढ़कर देखो,
फ़िर बतलाओ इन्सान मैं किस तरह का हूँ !

|||फ़राज़|||

गाहक= Customer.
मुस्ताहिक़= Deserving
ज़िक्र= Narration, Remembrance, Talk.
मुख़्तसर= Brief, Short.
क़िस्सा= Tale, Story
दास्ताँ= Story, Fable, Tale.
मुन्किर= Rejecting, Atheist, One who denies.
मुसाफ़िर= Traveller.
कारवां= Caravan. A company of travellers.
मुन्तज़िर= Expectant, One who waits.
महमाँ= Guest.
ईमान= Belief, conscience, Faith
अशआर= Couplets



शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

दिवाली !!!

इस दिवाली अँधेरा कुछ यूँ मिटाया मैंने,
एक दिया मस्जिद में भी जलाया मैंने !

मज़हबी दीवार में खोल के मन की खिड़की,
मंदिर को मस्जिद से कुछ यूँ मिलाया मैंने !

एक रूठा हुआ दोस्त फ़िर नज़र आया,
भूलकर शिक़ायतें गले उसको लगाया मैंने !

एक दिये की लौ में जब तू नज़र आया,
हर दिया फ़िर तुझे याद करके जलाया मैंने !

ग़रज़ थी अपने पड़ोस को खुशबू से भरना,
घर अपना उनके लिए था महकाया मैंने !

पड़ोसी की एक दीवार भी सज गई थी,
यूँ तो घर बस अपना था सजाया मैंने !

तेरे आँगन में भी फल और छाँव देगा,
शजर जो अपने आँगन में है लगाया मैंने !

माना कि जायज़ नहीं मुसलमान पर लेकिन,
उस्ताद के पैरों को हाथ था लगाया मैंने !

|||फ़राज़|||

मज़हबी= Religious.
ग़रज़= Intention, Purpose.
शजर= Tree
जायज़= Legitimate. Prevailing.
उस्ताद= Teacher. 

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

सलाह !!!

हर हार को तुम कुछ यूँ हरा देना,
मुश्किल जो आ जाये तो मुस्कुरा देना !

क्या ख़बर तुझे इसी राह से लौटना भी हो,
रास्ते के हर पत्थर को तुम हटा देना !

इससे बेहतर इबादत क्या होगी मौलवी साहब,
दो प्यार करने वालों को मिला देना !

दुआ अगर अर्श तक पहुँचाना चाहो,
क़ैद परिंदों को तुम उड़ा देना !

तेरा सिक्का न चलेगा बाद मरने के,
क़र्ज़ ज़िन्दगी में सभी तुम चुका देना !

बात दिल की हो तो दिल में रखना,
अगर कोई दिल से पूछे तो बता देना !

होके मदहोश तो वो सच बोलेगा ही,
'फ़राज़' को धोखे से तुम पिला देना !

अहवाल अगर वो मेरा दरयाफ़्त करे,
मेरे अशआर तुम उसको सुना देना !

वो फ़िर मिलेगा एक नया चेहरा लेकर,
आइना टूटा हुआ उसको दिखा देना !

कुछ तो गुनाह तेरे माफ़ हो जायेंगे ज़रूर,
किसी रोते हुए बच्चे को तू हँसा देना !

रौशनी महदूद न रहे महज़ दिवाली तक,
चराग़ हर अमावास रात में तुम जला देना !

|||फ़राज़|||

इबादत= Prayer, Adoration.
अर्श= Sky
क़ैद= Imprisonment, Bondage,
परिंदे= Birds
क़र्ज़= Debt, Loan.
मदहोश= Intoxicated.
अहवाल= Condition, State, Circumstance.
दरयाफ़्त= Inquiry, Investigation.
महदूद= Bound, Restrict.
महज़= Merely, Only.
चराग़= An oil lamp.

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

मैं !!!

तुझको अक्सर मैं छू के गुजरूँगा,
झौंका मैं इसी शहर की हवा का हूँ !

मेरा बचपन तेरे आँगन में भी तो खेला है,
बच्चा तो मैं पड़ोस के ही मकां का हूँ !

मुझको बहला न पाओगे तुम चराग़ों से,
मैं तलबगार तो सिर्फ़ कहकशां का हूँ !

अरे ओ मेरी रौशनी से जलने वालों,
अभी सितारा तो बस मैं सुबह का हूँ !

जानवर खाने का शौक़ मैं भी रखता हूँ,
मुसलमान मैं भी कहाँ ख़्वाह-मख़ाह का हूँ !

अज़ान के वक़्त तुम भी ज़रा ख़ामोश रहो,
यूँ तो पाबंद मैं भी गुनाह का हूँ !

मुझको हिंदी में मज़हब तुम सिखलाओ,
मैं आलिम कहाँ अरबी ज़बां का हूँ !

क्यूँ न हो ग़ुरूर मुझे अपनी हस्ती पर,
ज़र्रा तो मैं भी उसी ख़ुदा का हूँ !

ख़ुद की आग में जलके मैं मुनव्वर हूँ,
मैं कहाँ परवाना किसी शमा का हूँ !

मेरी रगों में भी बहता है गंगा का पानी
मैं मुसलमान हूँमगर हिन्दोस्तां का हूँ !!!

|||फ़राज़|||
मकां= House, Home.
चराग़= An Oil Lamp.
तलबगार= Seeker, Claimant, Desirous.
कहकशां= The Galaxy, The Milky Way.
शौक़= Fondness, Desire, Ardor
ख़्वाह-मख़ाह= Simply, For No Reason, Just Like That.
अज़ान= The Islamic Call To Prayer
पाबंद= Punctual.
मज़हब= Religion.
आलिम= Scholar, Learned, Intelligent.
अरबी= Arabic
ज़बां= Tongue, Speech.
ग़ुरूर= Proud.
ज़र्रा= An Atom, A Particle.
मुनव्वर= Illuminated, Enlightened.
परवाना= Moth.

शमा= Candle.

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

सिफ़र!!!

सख्त़ धूप में जब मेरा सफ़र हो गया,
कच्ची मिट्टी सा था, मैं पत्थर हो गया !

चोट सहने का हुनर भी सीखा मैंने,
ख़ुद को तराशा तो मैं संगमरमर हो गया !

ऐ ठोकरों सुनो, तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूँ मैं,
गिरते सँभालते मैं भी रहबर हो गया !

एक तू मिल गया तो कई गुना सा हूँ,
एक तू नहीं तो मैं तन्हा सिफ़र हो गया !

शहर में मैंने जब घर ख़रीद लिया,
अपना सा ये सारा शहर हो गया !

आज माँ को फ़िर हंसाया मैंने,
नूर ही नूर मेरा सारा घर हो गया !

क़त्ल आज मैंने अपना माफ़ किया,
अपने क़ातिल पर मैं ज़बर हो गया !

तेरे दुश्मन की दाद तुझे हासिल है,
कामिल 'फ़राज़' तेरा हुनर हो गया !

|||फ़राज़|||

तराशा= chiselled
शुक्रगुज़ार=Thankful.Grateful.
रहबर= Guide, 
सिफ़र= Zero.Naught.
नूर=Light, Splendour.
क़त्ल= Murder.
क़ातिल= Murderer.
ज़बर= Superior, Greater
दाद= Words of praise.
कामिल= Perfect, Complete, Accomplished, Entire.

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

पहली नज़र !!!

काम जो पहली नज़र कर गई,
समझने में मेरी सारी उम्र गई!

वो यूँ संवर के सामने आया मेरे,
वक़्त की जैसे गर्दिश ठहर गई!

जाने किस रंग में वो रंग लेता है,
रंगत-ए-दिल-ए-नाशाद निखर गई!

उसने हिना से जो मेरा नाम लिखा,
मेरी तक़दीर उसकी हथेली पर उभर गई!

उसने जाते हुए मुड़ कर कुछ यूँ देखा,
रूठती क़िस्मत जैसे फ़िर से संवर गई!

देख कर उसने कुछ यूँ झुका ली नज़रें,
मत पूछ क्या मेरे दिल पर गुज़र गई!

उसकी तस्वीर से भी अब इश्क़ हो चला है,
ताकते हुए उसको शाम-ओ-सहर गई!

मेरे इश्क़ की तबस्सुम है उसके लबों पर,
'फ़राज़' आज तो तेरी झोली ही भर गई!

|||फ़राज़|||

गर्दिश= Circulation, Misfortune, Revolution
रंगत-ए-दिल-ए-नाशाद= Colour/Condition of disappointed heart.
शाम-ओ-सहर= Night and Day, Round the clock
तबस्सुम= Smile

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

इश्क़ का चर्चा !!!

हमको भी न ख़बर थी कि हमें प्यार हो गया,
फ़िर सारे ज़माने में कैसे इश्तिहार हो गया !

हर कोई पढ़ने लगा मुझको ख़बर की तरह,
तेरी आशिक़ी में आख़िर मैं अख़बार हो गया !

जो आये न थे कभी मेरी मिजाज़पुर्सी को,
उनको भी मेरी हंसी से सरोकार हो गया !

हर कोई पढ़ने लगा मुझको ख़बर की तरह,
तेरी आशिक़ी में आख़िर मैं अख़बार हो गया !

सर-ए-बाज़ार हर नज़र तेरा ही सवाल करती है,
इश्क़ का चर्चा मेरे शहर का कारोबार हो गया !

मुख़बिर तो उस गली में पहले भी थे 'फ़राज़',
उस राह का हर पत्थर अब पहरेदार हो गया !

|||फ़राज़|||

इश्तिहार= Advertisement, Notification.
मिजाज़पुर्सी= Asking for Wellbeing.
सरोकार= Concern, Relation.
सर-ए-बाज़ार= Openly, In public.
मुख़बिर= Spy, Informer, Reporter.

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

दावत-ए-रिन्दां

तुझे भुलाने के लिए ख़ुद को भूलना होगा,
दावत-ए-रिन्दां आज फ़िर क़ुबूलना होगा !

|||फ़राज़|||

दावत-ए-रिन्दां = Invitation of Drunk/Drunkard.

बुधवार, 27 सितंबर 2017

मुक़म्मल जहान !!!

ये हिक़ायत-ए-हस्ती तेरी
दुनिया में है मेहमान सी,
क्यूँ तलब रखता है तू
इस मुक़म्मल जहान की !

सुना है उसकी क़ब्र है
एक फ़क़ीर के बराबर में,
तामीर सोने चांदी की थी
जिस शख्स़ के मकान की !

वक़्त-ए-रुख़सत जिस्म ये
जायगा ख़ाली हाथ ही,
तब पैरवी ख़ुदा से करेगी
दौलत तेरे ईमान की !

सुन ज़रा जिंदा बशर,
कब्रगाहों से न डर,
मिट्टी में ही मिल जानी है
हस्ती हर इन्सान की !

तू भी तमन्ना करेगा
बेज़ुबान हो जाने की,
जो सज़ा मालूम हो तुझे
गीब़त-ओ-बोहतान की !

|||फ़राज़|||

हिक़ायत-ए-हस्ती= Story of the existence
तलब= Desire, Demand.
मुक़म्मल= Perfect, complete
फ़क़ीर= Mendicent, Dervish, Begger
तामीर= Construction.
वक़्त-ए-रुख़सत= Time of separation/ Parting.
पैरवी= Prosecution, Lobbying.
ईमान= Beliefe, Conscience, Creed, Faith
बशर= Human being.
कब्रगाह= Graveyard.
गीब़त= Back biting
बोहतान= False accusation, Calumny, False imputation.

बुधवार, 20 सितंबर 2017

नाज़-ओ-अंदाज़!!!

एक चाँद ने क़दम जो ज़मीं पर उतारे,
आसमान से शिक़ायत करने लगे सितारे !

मुसव्विर सा हूँ मैं डूबा दीदार में तेरे,
जलने लगे हैं तुझसे क़ुदरत के नज़ारे !

अंगड़ाई जो तूने ली तो मन लहराया सा है,
चाक जिगर होता है जो तू ज़ुल्फ़ संवारे !

नाज़-ओ-अंदाज़ जुदा तेरी हर अदा में हैं,
आजिज़ी भी यूँ सुनता है जैसे अहसान उतारे !

देखता भी यूँ है जैसे देखता ही न हो,
घायल से कर गए हैं मुझको तेरे इशारे !

तूफ़ान से लड़ने का शौक़ था तुझे 'फ़राज़',
बारहा घर बना लिया है समंदर के किनारे !

|||फ़राज़|||

मुसव्विर= Painter, Sculpturer, Photographer
क़ुदरत= Nature, The Universe.
चाक= Stil, Ton, Cut.
नाज़= Pride, Grace
अंदाज़= Mannerism.
आजिज़ी= Helplessness, Humility, Inability, Submissiveness.

मेरा साया!!!

तू मेरी सूनी आँखों को,
ख़्वाबों से रोज़ सजाता है !
मैले-धुंधले  मेरे मन को,
तू रंगों से भर जाता है !

जब रात अँधेरी घिरते ही,
मेरा साया खो जाता है !
तू चुपके से मन में आकर,
मेरे साया हो जाता है !

तू दूर हैं मेरी आँखों से,
पर दूर कभी न लगता है !
हमदर्द जो बनके आया तू,
आसान सा जीना लगता है !

जाने कैसा मरहम मुझको,
तेरी बातों से मिलता है !
उम्मीद के धागों से मेरे,
मन के ज़ख्मों को सिलता है !

न कोई वादा लेता है,
न शर्त कोई तू रखता है !
न बांधता है तू कसमों में,
न रिश्तों के बंधन रखता है !

तू दोस्त से ज़्यादा अपना है,
तू इश्क़ से ज़्यादा गहरा है !
मैं ख़ुद से ज़्यादा तेरा हूँ,
तू ख़ुद से ज़्यादा मेरा है !

|||फ़राज़|||

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

अशआर की हाज़िरी !!!

मेरी हस्ती को दरकार नहीं शीशों की,
रेज़ा-रेज़ा होकर मुझे शीशागरी आई है !

है ग़रज़ तो ले ले  तू मेरी ठोकरों से सबक़,
जा-ब-जा भटका हूँ तो मुझे रहबरी आई है !

बस यही पल हैं हक़ीकत, तू जी भर जी ले,
क्या ख़बर कौन सी सांस आखरी आई है !

फ़ुरसतें, आवारगी, और सब शौक़-ओ-जूनून,
आदतों के सौदे में हाथ ये नौकरी आई है !

चल के काँटों पे है मैंने हँसना सीखा,
हो के मिसमार तजुर्बों से मसख़री आई है !

तू क्यूँ हैरान होता है मेरी बेनियाज़ी पर,
तेरी बेरुख़ी से ही हमें ये ख़ुदसरी आई है !

तेरी सोहबत हुई तो इश्क़ को जाना हमने,
तेरी फ़ुरक़तों में हासिल ये शायरी आई है !

तू भी फ़राज़ के अल्फाज़ से हानत ले ले,
आज फ़िर मुझपर अशआर की हाज़िरी आई है !

|||
फ़राज़|||

दरकार= Need, Necessity.
रेज़ा-रेज़ा= Shattered.
शीशागरी= Glass making.
ग़रज़= Intention, Purpose, Object. 
जा-ब-जा= Everywhere
रहबरी= Guidance.
फ़ुरसत= Leisure.
आवारगी= Wandering, Waywardness.
शौक़= Ardour, Desires.
जूनून= Frenzy, Madness.
मिसमार- Demolished, Razed, Ruined.
मसख़री= Comedy, Funnyness.
बेनियाज़ी= Unconcern, Not being in any need.
बेरुख़ी= Ignorance, Indifference.
ख़ुदसरी= Obstinate, Stubbornness.
सोहबत= Association, Company.
फ़ुरक़त= Absences, Separation.
अल्फाज़= Words.
ज़हानत= Intelligence.
अशआर= Couplets.
हाज़िरी= Presence, Attendance.



बुधवार, 13 सितंबर 2017

बेनियाज़ !!!

बेनियाज़ जो तुझसे हम ज़रा हो गए,
इल्ज़ाम ये आया कि हम बेवफ़ा हो गए !

ख़ुदसे कोई शिक़ायत न रही बाक़ी,
जबसे तुझसे ही हम ख़फ़ा हो गए !

तेरे मसअले पर हम कुछ यूँ मिसाल हुए,
जीती जागती सी एक तालीमगाह हो गए !

हमें ही तो था इश्क़ उस जलती लौ से,
बरहा पतंगे की तरह हम फ़ना हो गए !

छुपा न पाएगी उन्हें कफ़न की चादर,
राज़-ए-ज़मीर जो तेरे बेरिदा हो गए !

उनका ख़ुदा शायद कोई और ही होगा,
क़त्ल करके जो लोग बेगुनाह हो गए !

कौन सुनाएगा तुझको अब कहानी मेरी,
अब तो मेरे क़ासिद भी बेजुबान हो गए !

चराग़ों की तरह रात हम भर जलते रहे,
मज़लूम-ए-तजाहुल हर सुबह हो गए !

|||फ़राज़|||


बेनियाज़= Independent, Carefree.
इल्ज़ाम= Blame
मसअला= Matter, Problem. 
मिसाल= Example, Instance, Model.
तालीमगाह= Seminary.
लौ= Candle flame, Ardent desire.
फ़ना= Destruction. 
राज़-ए-ज़मीर= Secret of Heart/Conscience/Mind.
बेरिदा=Uncover.
क़त्ल= Murder.
क़ासिद= Messenger.
मज़लूम= Victimised, One who is treated wrongfully or unjustly.
तजाहुल= Ignorance. 

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

मुख़्तसर!!!

तेरी कारसाज़ियों की सुनकर ख़बर आया हूँ,
ख़ुद की तलाश में आज मैं तेरे दर आया हूँ !

मुझको नहीं ख़्वाहिश तेरे दो जहान की,
आशियाने की तलाश में दर-ब-दर आया हूँ !

आज फ़िर दिल ने जो मयक़शी करना चाही,
रिंद बनकर आज फिर मैं तेरे दर आया हूँ !

तेरा अक्स भरम सा था नख़लिस्तान में,
ग़फ़लत में भटक कर मैं रहगुज़र आया हूँ !

तस्कीन शिफ़ा बनकर तेरी आँखों में रहती है,
अपनी आँखों से ख़ुद मैं पढ़ने ये खबर आया हूँ !

ये तो दिल है जो अपनी दवा ख़ुद ढूंढ लेता है,
मैं तेरी जानिब महज़ दिल की ज़िद पर आया हूँ !

अब क्या चढ़ाएगा कोई रंग ज़माना मुझपर,
रंगरेज़ के लबों को मैं लबों से छूकर आया हूँ !

सिर्फ सूरतें ही नहीं 'फ़राज़', सीरतें भी बदल गई ,
तू भी अधूरा आया, मैं भी मुख़्तसर आया हूँ !

|||फ़राज़|||

कारसाज़ी= Workmanship.
रिंद=Drankard.
नख़लिस्तान=Oasis
ग़फ़लत=Neglence.
तस्कीन= Comfort, Console.
शिफ़ा= Healing, Cure.
महज़= Only.
रंगरेज़= Dyre
जानिब= Towards.
मुख़्तसर= Concise, Insignificant, Abbreviated.

बुधवार, 6 सितंबर 2017

दिल के फ़रेब

रूबरू ख़ुद से मैं जिस पल हो गया,
एक पहेली सा था, मैं हल हो गया !

दिल के हर फ़रेब की किताबत की है,
कीमियागरी अब मेरा शग़ल हो गया !

जब भी तेरा नाम मेरी ज़ुबान पर आया,
मुख़ालिफ़ मेरे ये सारा शहर हो गया !

कुछ ठिकाने फ़िर कभी न आबाद हुए,
मेरे शहर से जब मैं शहर-बदर हो गया !

आना तो न था मुझे वापस तेरे दर पर ,
फ़क़त आदतन मुझसे ये अमल हो गया !

बिखरा सा था तू अब तलक ख़यालों में,
मैंने समेटा लिया तो तू ग़ज़ल हो गया !

|||फ़राज़|||

फ़रेब= Deception, Deceit.
किताबत= Correspondence.
कीमियागरी= Alchemy.
शग़ल= Hobby.
मुख़ालिफ़= Opposite, Enemy.
शहर-बदर= Outcasted, Exiled.
फ़क़त= merely, simply, only.
आदतन= Habitually.
अमल= Act.

सोमवार, 4 सितंबर 2017

इश्क-ए-कामिल!

एक रूह क़ैद है मेरे जिस्म की पिंजरे में,
ऐ ख़ुदा ये क्या अज़ीयत मुझपे नाज़िल है !
मेरी नाकामियां पढ़कर मुझे कहता क़ाबिल है,
हमने तो सुना था कि ज़माना बहुत फ़ाज़िल हैं !

ऐ मुश्किलों तुमसे हर बार जीत जाता हूँ,
मेरी निगाह में हरदम मेरी मंज़िल है !
तू भी आज अपने लहू की तासीर बता,
मेरी रगों में तो मेरे अल्फाज़ शामिल हैं !

बेक़रारियाँ, रतजगे, हूक सी दिल में है,
तेरी उम्मीद में इतना तो हमें हासिल है !
बारहा मेरे होश-ओ-हवास से भी तो तू जाता रहा,
फ़िर क्यूँ तेरे ख़्वाब से मेरी पलकें बोझिल हैं !

मेरे जनाज़े पर वो मेरा ही पता पूछता है,
बहुत ही मासूम सा वो मेरा क़ातिल है !
मेरे ज़िक्र पर अब भी वो चौंक सा जाता है,
नाक़ाम ही सही 'फ़राज़', इश्क तेरा कामिल है !

|||फ़राज़|||


नाज़िल= Descend.
फ़ाज़िल= Intelligent, wise, Expert.
तासीर=Effect, Influence, Impression.
होश-ओ-हवास= All Conciousness and Sense.
कामिल= Perfect.