जब रूठे दिल को अपने
ख़ुद ही बहलाना पड़ता है !
जब मन की हर एक उलझन को
खुद ही सुलझाना पड़ता है !
जब सावन इस मन बंजर को
तुम जैसा सींच नहीं पाता !
और तकिये का एक हिस्सा
जब ख़ाली- ख़ाली लगता है !
तब दिल के इन अंधेरों में
मैं तेरी याद जलाता हूँ !
तू मुझमें जलती रहती है
मैं ही तुझमें सो जाता हूँ !
||| फ़राज़ |||