मंगलवार, 21 नवंबर 2017

तजुर्बा !!!

क़दम ज़मीन पर ही रखता हूँ हमेशा,
निगाह में है सारा आसमां रखा !
याद अपनी हस्ती को भी रखना था,
एक कुरता अलमारी में फटा सा रखा !

निगाह में मेरी बुलंद आसमां है,
परवाज़ को मैंने बाज़ के जैसा रखा !
सोने से कुंदन बनने की ज़िद में,
एक जूनून दिल में दहकता रखा !

दास्ताँ ज़रा तवील लिखनी थी मुझे,
कलम रातों में अक्सर जागता रखा !
यूँ तो मैं ख़ामोश तबियत हूँ लेकिन,
कलम में हुनर है चीख़ता रखा !

मुझे सीखना था हुनर बदल जाने का,
वक़्त को था मैंने रहनुमा रखा !
संभालना भी मैं सीख ही गया 'फ़राज़',
अपनी ठोकरों से था मैने तजुर्बा रखा !!!

|||फ़राज़|||


आसमां= Sky
हस्ती= Existence, Life.
बुलंद= Raised, High, Great.
परवाज़= Flight
कुंदन= Pure Gold, Fine.
दहकता= Aflame.
दास्ताँ= Story, Tale.
तवील= Long, Lengthy.
ख़ामोश तबियत= Introvert
हुनर= Talent, Skill.
रहनुमा= Guide, 
तजुर्बा= Experience.






रविवार, 19 नवंबर 2017

अगरचे!!!

सरगुज़िश्त अपनी पढ़नी थी,
रु-ब-रु ख़ुद के मैंने आईना रखा !
हर पल में है मैंने जीना सीखा,
हौसला मैंने इस तरह रखा !

पड़ोस भी घर सा लगता है,
दरीचा उधर का भी खुला रखा !
ग़रज़ सवाब की रही हो या न हो,
दरवाज़े पर अपने उजाला रखा !

कलमे की शहादत भी मैं देता हूँ,
मयकदों से भी मैंने सिलसिला रखा !
राब्ता मस्जिद से यूँ तो कम है अपना,
अगरचे दिल में हमेशा ख़ुदा रखा !

किसीकी फ़िक्र करने लगा हूँ मैं,
ये राज़ उस ही से है मैंने छुपा रखा !
अजब कारोबार है इश्क़ का 'फ़राज़',
जिसमें हार जाने में ही नफ़ा रखा !

|||फ़राज़|||

सरगुज़िश्त= biography
रु-ब-रु= In front of, Face to face.
हौसला= Courage
दरीचा= Window.
ग़रज़= Intention, Purpose.
सवाब= Reward of good deeds.
कलमा= The Muslim confession of faith.
शहादत= Testimony, Witness.
मयकदा= Bar, Tavern.
राब्ता= Contact
अगरचे= Although.
फ़िक्र= Concern
अजब= Amazing, Wonderful.
कारोबार= Business, Trade, Affair.
नफ़ा= Profit.

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

मोहताज !!!

सूख गए वो फूल जो तुझपर चढ़ाये थे,
ख़ुदा तो तू भी था, मगर पत्थर का था !

अब किसको मैं दिखाऊँ ज़ख़्म ये पीठ का,
ये वार तो किसी दोस्त के ख़ंजर का था !

यूँ तो मुआफ़ करता रहा ख़ुदा उम्र भर मुझको,
लेकिन आज  मुआ'मला तो रोज़-ए-महशर का था !

अपनी हसरतों के पैरों को मैंने छुपा कर रखा,
क्योंकि अरज ज़रा छोटा मेरी चादर का था !

रुकने की तड़प बहुत थी, मगर जाना भी था उसे,
ख़ुदारा आलम बुरा फ़िराक़ के उस मंज़र का था !

तेरे किरदार पर आज एक ग़ज़ल सुनी मैंने,
तू भी हमराज़ ज़रूर किसी शायर का था !

तू कभी मेरे दिल में झाँक कर देख न सका,
तू भी इन्सान था, मोहताज तू भी नज़र का था

जिसे दिल्लगी करके तूने ठोकर लगायी थी,
वो ग़ुरूर तो 'फ़राज़' के झुके सर का था !

|||फ़राज़|||

ज़ख़्म= wound
पीठ= Back
वार= Attack.
ख़ंजर= Dagger, Knife.
मुआफ़= Excused, Freed, Absolved.
मुआ'मला= Matter
रोज़-ए-महशर= Doomsday, The day of resurrection, The day of divine judgement.
हसरत= Unfulfilled desire
अरज= Width or measurement of the cloth.
ख़ुदारा= O God.
आलम= Condition
फ़िराक़= Separation, Absence, Departing 
मंज़र= Scene, View, Spectacle.
किरदार= Character, Manner, Coduct
हमराज़= Secret holder, Confidant.
मोहताज= Dependent, 
दिल्लगी= Amusement, Merriment.
ग़ुरूर= Pride

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

मोहब्बत!!!

दिल बता तूने फ़िर ये कैसी जुरअत की है,
तसव्वुर-ए-यार से ये कैसी मोहब्बत की है !

दिल तेरा बचपना भी जाने कब जाएगा,
तूने फ़िर चाँद को छूने की हसरत की है !

तरफ़दारी दिल-ए-नादां की हर बार मैं करता हूँ,
ज़हन ने तो हर बार दिल की मुख़ालिफ़त की है !

न मय, न मयकदा, न साक़ी, नशा फ़िर भी है,
अजब सी मयकशी मैंने बाद मुद्दत की है !

एक तस्कीन सी वाबस्ता है उन निगाहों में,
वो निगाह प्यार की है, वो निगाह रहमत की है !

तेरे अहसास में मुझे मस्जिद सा सुकून मिलता है,
तुझको जाना है तो मैंने ख़ुदा की भी इबादत की है !

मेरी भटकती रातों में सितारा तू सुबह का है,
एक सफ़र नेक सा तू, एक राह तू जन्नत की है !

तू दोपहर में साया, तू शाम की है लाली,
ताज़गी तू सुबह की, तू रात फ़ुर्सत की है !

अब तरन्नुम सा मुझे हर ख़याल लगता है,
मेरे ख़यालों ने तेरे ख़याल से उल्फ़त की है !

इसे ग़ज़ल न समझ ओ मुझे पढ़ने वाले,
हाल-ए-दिल सुनाने को तुझसे किताबत की है !

|||फ़राज़|||

जुरअत= Courage, Bravery, 
तसव्वुर-ए-यार= Imagination of Beloved.
तरफ़दारी= Leaning
दिल-ए-नादां= Innocent Heart, Improvident. 
ज़हन = Mind
मुख़ालिफ़त= Opposition, Disagreement
मय= Wine, Liquor. 
मयकदा= Bar, Tavern
साक़ी= One who serves wine,
मयकशी= Boozing, To drink
मुद्दत= Period, Time, Duration.
तस्कीन= Comfort.
वाबस्ता= Related, Connected. Bound together.
रहमत = Divine blessing, Divine mercy, Kindness
इबादत = Prayer, Adoration.
सफ़र= Journey.
नेक= Good, Virtuous.
जन्नत= Paradise, Heaven.
ताज़गी= Freshness. Newness.
फ़ुर्सत= Leisure
हाल-ए-दिल= Condition of heart.
किताबत= Writing, Calligraphy.
तरन्नुम= Modulation, A kind of song.
ख़याल= Thought, Imagination.
उल्फ़त= Love, Affection, 

शनिवार, 11 नवंबर 2017

इता'अत !!!

खेल नहीं है मियां झूठ सर-ए-आम बोलना,
ताज़ीम इसलिए ही तो करता हूँ सियासतदानों की !

रहने दे 'फ़राज़' की एक र्क़ गन्दा हो जायगा,
तफ़सीर लिख देगा अगर तू हुक्मरानों की !

माना की भुला दिया मुझको तेरे शहरवालों ने,
हर ईंट पहचानती है मुझे शहर के मकानों की !

बेक़द्र मैं भटका किया ज़हीनों की बस्ती में,
इस्तक़बाल मेरा हुआ महफ़िल में दीवानों की !

आज फ़िर भगवान् के नाम पर इंसान मारा गया,
आज फ़िर इंसानियत हारी है बस्ती में इंसानों की !

एक फ़क़ीर कैसे भूखा लौट गया यहाँ से,
बस्ती तो ये हुआ करती थी मुसलमानों की !

ये भी देखना है कि मैं चराग़ हूँ या सूरज,
ताक में रहता हूँ मैं अक्सर तूफ़ानों की !

'फ़राज़' तू क़दम भी ज़रा संभल के रक्खा कर,
लोग इता'अत करते हैं क़दमों के निशानों की !

|||फराज़|||

ताज़ीम= Respect
सियासतदान= Politicians.
र्क़= page.
तफ़सीर= Explanation, commentary.
हुक्मरानों= Ruler. Politician. 
बेक़द्र= Unappreciated.
ज़हीनों = intelligent, ingenious.
इस्तक़बाल = Reception, Welcome.
महफ़िल= Assembly, Gathering, Party.
इंसानियत = Humanity.
फ़क़ीर= Mendicant, Dervish, Beggar.
बस्ती = Village.
चराग़= An oil lamp.
ताक= Wait. Look, Glance, Aim
इता'अत= Follow, To obey, To comply, 

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

हसरतें !!!

कैसी अकड़ तुझको तेरे जिस्म-ए-फ़ानी पर,
अकड़ तो लाश जाती है, तू अकड़ता क्यूँ है !

ख़ुदा से भी डरता नहीं ये दिल तेरा,
तो मौत से दिल भला डरता क्यूँ है !

ख़ुद को बताता है तू अह्ल-ए-सुन्नत,
पंख परिंदों के भला तू कतरता क्यूँ है !

तुझको मालूम है न आयगा वो अयादत करने,
आह भरता है तू तो आह तू भरता क्यूँ है !

कहते हैं कि प्यार है ताउम्र का नशा
है अगर ये नशा तो फ़िर उतरता क्यूँ है !

सबको तो मालूम है पता तेरे नए घर का
डाकिया अब भी मेरी गली से गुज़रता क्यूँ है !

तेरे दामन से लिपटे हैं मेरे लम्हें अब भी
वक़्त मुट्ठी से रेत सा फिसलता क्यूँ है !

तू तो कहता की अब तुझे फर्क़ नहीं पड़ता
देख कर मुझको अब तू संभालता क्यूँ है !

मेरे तसव्वुर में झाँक कर देखो तो जानोगे
दिल मेरा उसको पाने को मचलता क्यूँ है !

लौट आएगा फ़िर से तेरा गुज़रा हुआ कल,
जागती आँखों में ये ख़्वाब टहलता क्यूँ है !

ऐ फ़राज़ तू अब बच्चा तो नहीं है,
हसरतें चाँद को छूने की करता क्यूँ है !

|||फ़राज़|||

जिस्म-ए-फ़ानी= Mortal Body.
परिंदा= Birds
अयादत= visiting, inquiring (after ailing person)
ताउम्र= Life long
दामन= Hem,
फ़र्क= Difference.
तसव्वुर= Imagination, Contemplation.
अह्ल-ए-सुन्नत= When Islam was being broken into sects on small differences, a majority of the believers who stayed close to the guidance and teachings of the Messenger of Allah (saws), came to be recognized as the Ahle-Sunnah wal Jamaa. Their main principle was to stay close to the teachings of the Quran and Sunnah, and stay within the Jamaa or Ummah of Muslims without joining any of the breakaway sects. Thus their name: Ahle-Sunnah wal Jamaa (those who follow the Sunnah and stay with the Jamaa or community).

रविवार, 5 नवंबर 2017

हस्ती !!!

तू धूल चढ़ा रहा था मुझपर लेकिन
देख हवा चली और मैं ग़ुबार हो गया !

तू फेंकता रहा मुझपर कंकर पत्थर
मैं हुनरमंद था, देख मैं मीनार हो गया !

क़फ़स न क़ैद कर सकी मेरी आवाज़ को
एक कलम के ज़रिये मैं अख़बार हो गया !

मुझको आता है हुनर तूफ़ान से खेलने का
चिंगारी था मैं, आँधियों में अंगार हो गया !

एक तू कि अपनों को भी मरहम न दे सका 
एक मैं कि ग़ैरों का भी ग़मख़्वार हो गया !

मैंने सुना था कि इश्क़ है ज़रिया सवाब का
हसरत-ए-सवाब में मैं गुनाहगार हो गया !

आज फ़िर शहर में हमारा चर्चा क्यूँ है
क्या कोई ख़बरनवीस मेरा यार हो गया !

वो बेचता रहा हस्ती शोहरत के बाज़ार में
देख मेरे कलाम ख़ुद मेरा इश्तिहार हो गया !

बस पड़ोसी के लिए दुआ ही तो की थी
क्यूँ भला मैं वतन का ग़द्दार हो गया !

ये ज़िन्दगी तो सदा किराए का घर रही
ज़ेर-ए-कब्र तो मैं भी ज़मींदार हो गया !

|||फ़राज़|||

ग़ुबार= Dust Storm.
हुनरमंद= Skilled
मीनार= Minaret.
क़फ़स= Prison, Cage.
कलम= Pen.
हुनर= Skill. Art, Knowledge.
चिंगारी= Spark, Scintilla.
मरहम= Ointment, Remedy.
ग़ैर= Stranger,
ग़मख़्वार= Consoler. Sympathizer.
इश्क़= Love.
सवाब= Reward of good deeds
हसरत-ए-सवाब= Desire of the reward for good deeds
गुनाहगार= Sinner, Guilt, Criminal, Culprit.
शहर= City.
चर्चा= Gossip, Rumor.
ख़बरनवीस= Journalist
यार= Friend
हस्ती= Existence, Life.
शोहरत= Fame, Renown.
बाज़ार= Market
कलाम= Word, Speech,
इश्तिहार= Advertisement, Notification.
ग़द्दार= Disloyal, Traitor.
ज़ेर-ए-कब्र= Under the Grave
ज़मींदार= Landlord

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

दुश्वारी!!!

क्या अजब चाहत थी, क्या ग़ज़ब दुश्वारी थी,
घर मेरा मिट्टी का था, बरसात से मेरी यारी थी !
तूफ़ान को भी ख़ुदारा क्यूँ आज ही आना था,
आज ही तो मैंने कश्ती लहरों में उतारी थी !

जब आँख खुली मेरी तो ये इल्म हुआ मुझको
मदहोशी जिसको समझा, वो तो बस ख़ुमारी थी !
न मैंने ही आवाज़ दी, न तुमने मुड़कर देखा,
तुमको भी था ग़ुरूर, मेरी भी कुछ ख़ुद्दारी थी !

जिसकी आतिश में जलकर हम ख़ाक हो गए,
बुझकर भी न बुझ सकी, जाने कैसी चिंगारी थी ! 
'फ़राज़' तेरे इश्क़ को तो नाकाम होना ही था,
तू सुखन का ताजिर था, उसकी नौकरी सरकारी थी !

|||फ़राज़|||

दुश्वारी= Difficulty.
ख़ुदारा= Oh God.
इल्म=Knowledge, Learning.
मदहोशी= Intoxication.
ख़ुमारी= Hangover
ग़ुरूर= Proud
ख़ुद्दारी= Self-respect
आतिश= Fire, Flame
ख़ाक= Dust, Ashes, Worthless.
चिंगारी= Spark, Scintilla.
नाकाम=Unsuccessful, Failure.
सुखन= Speech, Language, Words,
ताजिर= Trader.

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

इंतज़ार !!!

माना कि ये प्यार नहीं, कुछ और है,
दिल तेरा इंतज़ार फ़िर भी करता क्यूँ है !

दिल जानता है कि तेरी तलाश ख़सारे होंगे,
दिल तेरी गली से फ़िर भी गुज़रता क्यूँ है !

कभी चाँद ने देखा था वस्ल दो सितारों का,
मैं तो ग़र्दिश में हूँ मगर चाँद भटकता क्यूँ है !

तू तो छत पर सिर्फ़ मेरे लिए आता था,
तो अब भी चाँद रातों में निकलता क्यूँ है !

मेरे ज़िक्र पर वो अब भी चौंक जाता है,
ऐसा करता है, तो वो ऐसा करता क्यूँ है !

उसकी आँखों में अब कोई और बस गया है,
तू अभी तक उसके लिए संवारता क्यूँ है !

तू दिल्लगी ही कह देता इस रब्त को,
मोहब्बत को तू बदनाम करता क्यूँ है !

ज़हन को भी वो छू गया होगा 'फ़राज़',

हर इल्ज़ाम दिल पर ही धरता क्यूँ है !

|||फ़राज़|||


ख़सारे= Losses

वस्ल= Meeting, Union.
ग़र्दिश= Misfortune, Circulation, Rotation.
ज़िक्र= Narration, Remembrance, Talk.
रब्त= Connection, Relation, Bond, Intimacy.
ज़हन= Mind.
इल्ज़ाम= Blame

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

अशआर !!!

दर्द खरीदने आया हूँ फ़िर दिल के बदले,
आज गाहक फ़िर मैं तेरी दुकान का हूँ !

मैंने ही जुर्म किया था मोहब्बत करके,
मुस्ताहिक़ तो बस मैं ही सज़ा का हूँ !

तेरी कहानी में मेरा ज़िक्र तो आना ही था,
मुख़्तसर ही सही, क़िस्सा तेरी दास्ताँ का हूँ !

तुझको चाहा बहुत मगर  पूज सका,
शायर हूँ, न की मुन्किर मैं ख़ुदा का हूँ !

भटक के बहुत दूर निकल आया हूँ,
मुसाफ़िर तो मैं तेरे ही कारवां का हूँ !

जलता देखा है क्या कभी अपने घर को,
मुझसे सुनो, मुसलमान मैं बर्मा का हूँ !

अबकी आये तो कभी छोड़कर न जाए,
मुन्तज़िर मैं ऐसे किसी महमाँ का हूँ !

प्यार के लालच में ही फँस जाता हूँ,
यूँ तो पक्का मैं भी ईमान का हूँ !

उनकी आँखें मुझे देख के जगमगाती हैं,
सितारा मैं माँ बाप की निगाह का हूँ !

पहले तुम मेरे अशआर तो पढ़कर देखो,
फ़िर बतलाओ इन्सान मैं किस तरह का हूँ !

|||फ़राज़|||

गाहक= Customer.
मुस्ताहिक़= Deserving
ज़िक्र= Narration, Remembrance, Talk.
मुख़्तसर= Brief, Short.
क़िस्सा= Tale, Story
दास्ताँ= Story, Fable, Tale.
मुन्किर= Rejecting, Atheist, One who denies.
मुसाफ़िर= Traveller.
कारवां= Caravan. A company of travellers.
मुन्तज़िर= Expectant, One who waits.
महमाँ= Guest.
ईमान= Belief, conscience, Faith
अशआर= Couplets



शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

दिवाली !!!

इस दिवाली अँधेरा कुछ यूँ मिटाया मैंने,
एक दिया मस्जिद में भी जलाया मैंने !

मज़हबी दीवार में खोल के मन की खिड़की,
मंदिर को मस्जिद से कुछ यूँ मिलाया मैंने !

एक रूठा हुआ दोस्त फ़िर नज़र आया,
भूलकर शिक़ायतें गले उसको लगाया मैंने !

एक दिये की लौ में जब तू नज़र आया,
हर दिया फ़िर तुझे याद करके जलाया मैंने !

ग़रज़ थी अपने पड़ोस को खुशबू से भरना,
घर अपना उनके लिए था महकाया मैंने !

पड़ोसी की एक दीवार भी सज गई थी,
यूँ तो घर बस अपना था सजाया मैंने !

तेरे आँगन में भी फल और छाँव देगा,
शजर जो अपने आँगन में है लगाया मैंने !

माना कि जायज़ नहीं मुसलमान पर लेकिन,
उस्ताद के पैरों को हाथ था लगाया मैंने !

|||फ़राज़|||

मज़हबी= Religious.
ग़रज़= Intention, Purpose.
शजर= Tree
जायज़= Legitimate. Prevailing.
उस्ताद= Teacher. 

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

सलाह !!!

हर हार को तुम कुछ यूँ हरा देना,
मुश्किल जो आ जाये तो मुस्कुरा देना !

क्या ख़बर तुझे इसी राह से लौटना भी हो,
रास्ते के हर पत्थर को तुम हटा देना !

इससे बेहतर इबादत क्या होगी मौलवी साहब,
दो प्यार करने वालों को मिला देना !

दुआ अगर अर्श तक पहुँचाना चाहो,
क़ैद परिंदों को तुम उड़ा देना !

तेरा सिक्का न चलेगा बाद मरने के,
क़र्ज़ ज़िन्दगी में सभी तुम चुका देना !

बात दिल की हो तो दिल में रखना,
अगर कोई दिल से पूछे तो बता देना !

होके मदहोश तो वो सच बोलेगा ही,
'फ़राज़' को धोखे से तुम पिला देना !

अहवाल अगर वो मेरा दरयाफ़्त करे,
मेरे अशआर तुम उसको सुना देना !

वो फ़िर मिलेगा एक नया चेहरा लेकर,
आइना टूटा हुआ उसको दिखा देना !

कुछ तो गुनाह तेरे माफ़ हो जायेंगे ज़रूर,
किसी रोते हुए बच्चे को तू हँसा देना !

रौशनी महदूद न रहे महज़ दिवाली तक,
चराग़ हर अमावास रात में तुम जला देना !

|||फ़राज़|||

इबादत= Prayer, Adoration.
अर्श= Sky
क़ैद= Imprisonment, Bondage,
परिंदे= Birds
क़र्ज़= Debt, Loan.
मदहोश= Intoxicated.
अहवाल= Condition, State, Circumstance.
दरयाफ़्त= Inquiry, Investigation.
महदूद= Bound, Restrict.
महज़= Merely, Only.
चराग़= An oil lamp.

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

मैं !!!

तुझको अक्सर मैं छू के गुजरूँगा,
झौंका मैं इसी शहर की हवा का हूँ !

मेरा बचपन तेरे आँगन में भी तो खेला है,
बच्चा तो मैं पड़ोस के ही मकां का हूँ !

मुझको बहला न पाओगे तुम चराग़ों से,
मैं तलबगार तो सिर्फ़ कहकशां का हूँ !

अरे ओ मेरी रौशनी से जलने वालों,
अभी सितारा तो बस मैं सुबह का हूँ !

जानवर खाने का शौक़ मैं भी रखता हूँ,
मुसलमान मैं भी कहाँ ख़्वाह-मख़ाह का हूँ !

अज़ान के वक़्त तुम भी ज़रा ख़ामोश रहो,
यूँ तो पाबंद मैं भी गुनाह का हूँ !

मुझको हिंदी में मज़हब तुम सिखलाओ,
मैं आलिम कहाँ अरबी ज़बां का हूँ !

क्यूँ न हो ग़ुरूर मुझे अपनी हस्ती पर,
ज़र्रा तो मैं भी उसी ख़ुदा का हूँ !

ख़ुद की आग में जलके मैं मुनव्वर हूँ,
मैं कहाँ परवाना किसी शमा का हूँ !

मेरी रगों में भी बहता है गंगा का पानी
मैं मुसलमान हूँमगर हिन्दोस्तां का हूँ !!!

|||फ़राज़|||
मकां= House, Home.
चराग़= An Oil Lamp.
तलबगार= Seeker, Claimant, Desirous.
कहकशां= The Galaxy, The Milky Way.
शौक़= Fondness, Desire, Ardor
ख़्वाह-मख़ाह= Simply, For No Reason, Just Like That.
अज़ान= The Islamic Call To Prayer
पाबंद= Punctual.
मज़हब= Religion.
आलिम= Scholar, Learned, Intelligent.
अरबी= Arabic
ज़बां= Tongue, Speech.
ग़ुरूर= Proud.
ज़र्रा= An Atom, A Particle.
मुनव्वर= Illuminated, Enlightened.
परवाना= Moth.

शमा= Candle.