शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

मोहताज !!!

सूख गए वो फूल जो तुझपर चढ़ाये थे,
ख़ुदा तो तू भी था, मगर पत्थर का था !

अब किसको मैं दिखाऊँ ज़ख़्म ये पीठ का,
ये वार तो किसी दोस्त के ख़ंजर का था !

यूँ तो मुआफ़ करता रहा ख़ुदा उम्र भर मुझको,
लेकिन आज  मुआ'मला तो रोज़-ए-महशर का था !

अपनी हसरतों के पैरों को मैंने छुपा कर रखा,
क्योंकि अरज ज़रा छोटा मेरी चादर का था !

रुकने की तड़प बहुत थी, मगर जाना भी था उसे,
ख़ुदारा आलम बुरा फ़िराक़ के उस मंज़र का था !

तेरे किरदार पर आज एक ग़ज़ल सुनी मैंने,
तू भी हमराज़ ज़रूर किसी शायर का था !

तू कभी मेरे दिल में झाँक कर देख न सका,
तू भी इन्सान था, मोहताज तू भी नज़र का था

जिसे दिल्लगी करके तूने ठोकर लगायी थी,
वो ग़ुरूर तो 'फ़राज़' के झुके सर का था !

|||फ़राज़|||

ज़ख़्म= wound
पीठ= Back
वार= Attack.
ख़ंजर= Dagger, Knife.
मुआफ़= Excused, Freed, Absolved.
मुआ'मला= Matter
रोज़-ए-महशर= Doomsday, The day of resurrection, The day of divine judgement.
हसरत= Unfulfilled desire
अरज= Width or measurement of the cloth.
ख़ुदारा= O God.
आलम= Condition
फ़िराक़= Separation, Absence, Departing 
मंज़र= Scene, View, Spectacle.
किरदार= Character, Manner, Coduct
हमराज़= Secret holder, Confidant.
मोहताज= Dependent, 
दिल्लगी= Amusement, Merriment.
ग़ुरूर= Pride

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