शनिवार, 31 दिसंबर 2016

एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !

गर दुनियावाले पूछें की
तेरा मेरा रिश्ता क्या है,
तू भूल जिसे न पाया है
आख़िर तेरा लगता क्या है,
तुम हंस के बात बना देना
कहना तुमको अब याद नहीं,
एक याद है बस भूली-बिसरी
एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !

गर शाम ढले फिर तन्हाई
अहवाल मेरा फिर पूछे तो,
जब तुझसे तेरी परछांई
गर हाल मेरा फिर पूछे तो,
इल्ज़ाम मुझे सब दे देना
तुम कहना उनसे राज़ नहीं,
बस दर्द-ओ-ग़म का बाईस था
एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !

जब जिस्म तेरा न तन्हा हो
पर रूह मेरी ज़िद को तड़पे,
जब चोट कोई तुमको पहुंचे
दिल याद मेरी करके तड़पे,
तुम लाख बुलाना चाहो जब
पहुंचे मुझतक आवाज़ नहीं,
तब लौट के फ़िर न आएगा
एक रिश्ता जो अब ख़ास नहीं !


फ़राज़...

रविवार, 25 दिसंबर 2016

एक ख़्वाब का सौदा !!!

हर रात मैं अपनी नींदों से
एक ख़्वाब का सौदा करता हूँ !
है ख़्वाब, तो टूट ही जाना है
पर नींदें ख़र्चा करता हूँ !

तू बनके ख़्वाब सिरहाने पर
तकिये पर अक्सर मिलता है !
हौले-हौले थपकी देकर
तू दूर कहीं ले जाता है !

जहाँ वक़्त के धागे लम्हों को
बंधन में बाँध नहीं पाते !
जहाँ उम्र थमी है बरसों से
जहाँ साथ थी भीगी बरसातें !

कुछ लम्हे जो थे ख़्वाब हुए
अब ख़्वाब में अक्सर मिलते हैं !
एक हसरत की सूरत बनकर
अहसास से बनकर मिलते हैं !

चादर पर सिलवट के जैसा तू
मन में सिलवट दे जाता है !
पलकों की मुंडेरों को तू
फिर से तर कर जाता है !

हर रात मैं अपनी नींदों से
एक ख़्वाब का सौदा करता हूँ !
है ख़्वाब, तो टूट ही जाना है
पर नींदें ख़र्चा करता हूँ !


|||फ़राज़|||

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

जब वो मनाने आया

वो आज अपनी कहानी सुनाने आया,
पथरायी आँखों को पानी बनाने आया !

कोई वादा न कोई कसम निभाने आया,
वो जब भी आया तो छोड़ जाने आया !

एक आस के सहारे हम जिंदा थे अब तलक,
वो आया भी तो क़दमों के निशान मिटाने आया !

रोज़ जलाता हूँ मैं ख़्वाब अँधेरा मिटाने के लिए,
मेरे जलते ख़्वाबों को वो कभी ना बुझाने आया !

फ़िर एक तमन्ना की, फ़िर बेज़ार हो गए,
वो फ़िर से आया तो मुझे छोड़ जाने आया !

शायद उसने आने में बहुत देर लगा दी होगी,
कोई रिश्ता न बचा था जब वो मनाने आया !

फ़राज़.....

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

तलाश

अपनी ही तलाश में निकला हूँ सफ़र को,
मौला तराश दे तू मेरे हुनर को !

एक फ़लसफ़ा यूँ लिखूं की बन जाये दास्ताँ,
कारीगरी सिखा दे तू नाक़ाम बशर को !

उन लम्हों को गुज़रे सदियाँ गुज़र गयीं,
वो तेरा छत पे आना भरी दोपहर को !

शायद गुज़रे वो शाम को फ़िर मेरी गली से,
हर रोज़ हूँ सजाता सितारों से मैं घर को !

वो चाँद बन के आता है शामों को फ़लक़ पे,
हर रात है गुज़री, तकते तेरे सफ़र को !

ले इम्तेहान तू मेरा पर मांगता हूँ ये,
मौला ज़रा बढ़ा दे तू मेरे सब्र को !

माना के ये अमावास बरसों से चल रही है,
एक तारा ही है काफ़ी निकलूं जब मैं सफ़र को !

तेरी रज़ा से मुमकिन हर काम हो गए, 
हूँ मांगता दुआ में तुझसे उस नज़र को !

फ़राज़... 

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

तू नहीं आया !


आज दिल ने फ़िर एक शिक़ायत की,
आज फ़िर छोड़ जाने तू नहीं आया !

हमने लाख रौशन कीं तेरी गलियां,
मेरी एक याद जलाने तू नहीं आया !

लोग अक्सर सवाल पूछते हैं कैसे कैसे,
ज़माने को झुठलाने कभी तू नहीं आया !

क्या कोई चुभन तेरे भी दिल में है बाक़ी ,
महज़ अफ़सोस जताने तो तू नहीं आया !

मेरी ख़ुशियों की तिजारत करने वाले,
मेरे ज़ख्मों को मिटाने तू नहीं आया !

तू ज़ख्म देकर ही सुकून पाता है,
बारहा मरहम लगाने तू नहीं आया !

क्या हक़ीकत थी नाक़ाम रिश्ते की,
बातें हज़ार समझाने तू नहीं आया !

तुझको फ़िर भुला दिया, कि कोई चारा न था,
कोई कसम कोई रिवायत निभाने तू नहीं आया !

ज़िक्र-ए-फ़ितरत तू न कर मुझसे ‘फ़राज़’,
कभी मुक़म्मिल हो जाने तू नहीं आया !


फ़राज़....

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

उजाला

जाने क्या असर है उसकी बातों में,
फिर ज़ख्म कोई भरने लगा हो जैसे !

वो इख़्तियार से हो रहा है दाख़िल,
ये जहाँ फिर सँवरने लगा हो जैसे !

एक उजाला सा मेरे घर में फैला है,
चाँद आँगन में उतरने लगा हो जैसे !

रंजिशें सब आज झूठी लगती हैं,
वक़्त फ़िर साजिशें करने लगा हो जैसे !

कुछ तो असर है दुआओं में मेरी,
वो मेरे नाम पे ठहरने लगा हो जैसे !

हर ख़याल मेरा महकने लगा है, 
मेरी हर सांस में तू घुलने लगा हो जैसे ! 

रुख हवाओं ने बदला है फिर से,
मौसम आज निखरने लगा हो जैसे !

रविवार, 27 नवंबर 2016

सिलसिला

अहसास फ़िर एक दबा सा ढूंढ लिया,
दिल ने दर्द का फ़िर पता ढूंढ लिया !

बेज़ार हो चला था दिल सुकूनियत से,
दिल आज़ारी का फ़िर मरहला ढूंढ लिया !

एक उम्र तलक रहे हैं आवारगी के दिन,
थके हुए क़दमों ने फ़िर आशियाँ ढूंढ लिया !

उससे शिक़ायत क्या करूँ की ग़ैर है वो,
ख़ुद से ही आज फ़िर गिला ढूंढ लिया !

अहसासों को तलाश थी अल्फ़ाज़ों की,
फिर से एक राज़ छुपा सा ढूंढ लिया !

सब इल्ज़ाम मैंने अपने नाम कर लिए,
पर तू न मिला, मैंने बेइन्तेहा ढूंढ लिया !

मेरे तू ख़्वाबों में भी ख़्वाब हो गया,
रतजगों का मैंने सिलसिला ढूंढ लिया !

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

इल्तिजा!!!

ऐ ख़ुदाहुनर तू मुझे इतना दे दे,
मेरे अहसास को लफ़्ज़ों में तर्जुमा दे दे !

ताउम्र भटकता रहा हूँ मुहाजिर जैसा,
ज़िन्दगी की सख़्तियों को सायबान दे दे !

नस्ल-ए-आदम का हर राज़ जानने वाले,
मुझको भी अपनी हस्ती के निशां दे दे !

वसाविस की गिरफ़्त में है हस्ती मेरी,
मेरे दिल को कोई नेक मशवरा दे दे !

ले इम्तिहान तू बेशक़पर इल्तिजा भी सुन,
सब्र करने का तू मुझे हौसला दे दे !

ये कैसी आज़माइश, कि रूह भी क़ैद है,
मेरी परवाज़ को तू मेरा आसमान दे दे !

रूह झुलसी है सफ़र-ए-आतिशां करते,
मेरी आवारगी को तू आशियाँ दे दे !

बहुत रुसवा हैं तेरा सजदा करने वाले,
ख़ुदारा इस क़ौम को भी तू कर्बला दे दे !

गुनाह भी करता है और तेरा सजदा भी,
मौला 'फ़राज़' को इबादत का सलीक़ा दे दे !

|||फ़राज़|||

तर्जुमा= Translation.
ताउम्र= Lifelong. All life.
मुहाजिर= Refugee, Emigrant.
सख़्तियां= Hardships, Rigidities.
नस्ल-ए-आदम= Ancestry of Adam.
निशां= Mark, Sign.
वसाविस= Evil thoughts, Bad thoughts.
गिरफ़्त= Lock, Objection
मशवरा= Consultation, Suggestion.
इल्तिजा= Request, Plead.
आज़माइश= Examination, Trail, Test.
परवाज़= Flight.
सफ़र-ए-आतिशां= Journey of fire.
आवारगी= Wandering, Waywardness.
आशियाँ= Nest, Shelter
ख़ुदारा= O God.
क़ौम= Tribe, Race, People.
कर्बला= A place in Iraq where Imam Hussain was assassinated and buried in a holy war.
रुसवा= Dishonored, Despondent.
सजदा= Bowing in Prayer so as to touch the ground with the forehead.
मौला= God.
सलीक़ा= Good manner, Discreet of good disposition.


शनिवार, 19 नवंबर 2016

महरूमियत


आज फ़िर यूँही गुज़रा मैं जो बीते कल से,
रूह को बाक़ी तेरी महरूमियत आज भी है !
काश यूँ भी होता की साथ तू भी होता,
एक दबी-दबी सी हसरत आज भी है !

तेरे ख़याल पर कुछ ठहर सा जाता हूँ,
एक पहले सी मेरी फ़ितरत आज भी है !
रात, चाँद, सितारे और तन्हाई भी है,
और साथ मेरे फ़ुरक़त आज भी है !

कुछ देर चाँद दिखा और फिर छुप गया,
तुझ जैसी इसकी आदत आज भी है !
बस रात और ख़ामोशियाँ ही रहे फ़िर बाक़ी,
बस इतनी ही मेरी सोहबत आज भी है

तू ख़्वाब में आया, फ़िर न नींद आई,
हर रात की सी हालत आज भी है !
चल भूल ही जाते हैं ‘फ़राज़’ उसको
बाक़ी बस यही सूरत आज भी है !

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

दहलीज़

एक सिहरन सी मेरी रगों में दौड़ती है,
सांस तेरी मुझे छू के गई हो जैसे !
बेसाख़्ता ही मुस्कुरा दिया एक ख़याल से मैं,
तेरी बातों में आज भी कोई गुदगुदी हो जैसे !

तेरी गर्दिश मेरे ज़हन में यूँ रहती है,
मेरी धड़कन से बाक़ी तेरी दोस्ती हो जैसे !
तेरे वजूद को ढूंढती हैं अक्सर बाहें,
मुझमें बाक़ी सी तेरी तिश्नगी हो जैसे !

हर अपने की अपनाईयत से वाकिफ़ हूँ,
धुंध आँखों से मेरी छंट गयी हो जैसे !
कल मैं गुज़रा था फ़िर तेरी गलियों से,
वो दीवार-ओ-दर अब अजनबी हों जैसे !

मेरे नाम से अब भी तू चौंक सा जाता है,
फांस कोई सीने में चुभी रह गयी हो जैसे !
तेरे अहसास ने फिर टटोला यूँ मेरे दिल को,
मेरी दहलीज़ पर आज भी तू खड़ी हो जैसे !

|||फ़राज़|||

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

दस्तक

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...

पर कुछ निशानियाँ बच गयी होंगी
बंद अलमारी के किसी कोने में,
अपने कुछ पुराने कपड़ों के बीच
जो तुमने छुपा के रखी थीं !

पर शायद अब वो फूल न होगा,
जो तुमने अपनी एक डायरी में,
मुलाक़ात के साथ रख छोड़ा था,
तेरी लिखावट में मेरे निशान बाकी होंगे !

कुछ लम्हें आज भी सिमटे मिल जाएँगे
गुज़रे कल की धुंधली तस्वीरों में,
पर कुछ लम्हों को तो तुमने
महज़ यादों में ही खंगाला होगा !

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...
थक के लौट आती है तेरे दर से
अक्सर मेरी मायूस दस्तक !

कुछ लोग बारहा वहां अब भी रहते हैं,
पर अब वहां वो नहीं रहता,
जो मेरी हलकी सी आहट सुनकर,
          घरवालों से हज़ार बहाने करके,
दौड़ के आ जाता था खिड़की पर,
कभी छ्त, तो कभी दरवाज़े पर!


मेरे ख़याल मुझे ही छल कर,
अक्सर उस गली में ले जाते हैं,
दस्तक उस दर पर देते हैं,
पर कोई जवाब नहीं आता !

मैं जानता हूँ कि तू नहीं रहता
अब मेरे पड़ोस के उस घर में...