गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

मैं तुझमें सो जाता हूँ !

जब रूठे दिल को अपने
ख़ुद ही बहलाना पड़ता है !
जब मन की हर एक उलझन को
खुद ही सुलझाना पड़ता है !

जब सावन इस मन बंजर को
तुम जैसा सींच नहीं पाता !
और तकिये का एक हिस्सा
जब ख़ाली- ख़ाली लगता है !

तब दिल के इन अंधेरों में
मैं तेरी याद जलाता हूँ !
तू मुझमें जलती रहती है
मैं ही तुझमें सो जाता हूँ !

||| फ़राज़ |||

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

अँधेरे !!!

मेहरबानियाँ उजालों की है जिस्म की रंगत,
अँधेरे कभी रंगतों पर रिआ'यत नहीं करते !

देखते सबकुछ हैं मगर ख़ामोश रहते हैं,
अँधेरे गुनाहों की शिक़ायत नहीं करते !

अस्ल किरदार होते हैं अंधेरों में वो लोग अक्सर,
उजालों में जो लोग कभी शरारत नहीं करते !

वो क्या समझेंगे उजालों के हुस्न को,
जो लोग अंधेरों से कभी सोहबत नहीं करते !

फ़क़त चाँद की तलब में हर शब् चले आते हैं,
ये अँधेरे किसी शम्स की हसरत नहीं करते !

लगता है अँधेरा कोई उनके भी दिल में है,
उजालों से आजकल वो मिल्लत नहीं करते !

||| फ़राज़ |||



मेहरबानियाँ= Kindness
रंगत = colour.
रिआ'यत= Concession
शिक़ायत= Complaint
अस्ल= Real
किरदार= Character
शरारत= Mischief
हुस्न= Beauty
सोहबत= Company, Association 
फ़क़त= Only, Merely
तलब= Desire, Urge
शब्= Night
शम्स= The Sun
हसरत= Desire
मिल्लत= Meeting

रविवार, 23 अप्रैल 2017

फ़िक्र !!!

यूँ तो मेरे भी इर्द-गिर्द
हमदर्द-ओ-ग़मख़्वार हैं
तू हाल मेरा पूछ ले,
ये जहाँ मुझसे जल जाए !

आरज़ू के दो दिनों में
हमने गुज़ारी उम्र है
हसरतों की रात ये,
यूँ ही कहीं न ढल जाए !

चल सितारों में ही अब
कर लें कहीं हम आशियाँ,
इससे पहले कि ज़माना
फ़िर चाल कोई चल जाए !

पहलू में आ गए हो तो
ख़ामोशियों को तोड़ दो
शर्म-ओ-हया में फ़िर कहीं,
ये रात भी न ढल जाए !

तेरी वफ़ाओं पर यकीं,
यूँ तो बहुत ऐ यार है,
डर है मुझे कि दिल कहीं
तेरा न फ़िर संभल जाए !

||| फ़राज़ |||

हथेली

एक शाम मेरी हथेली पर
अपनी ऊँगली से 
लिखा था तुमने
"मुझे प्यार है तुमसे"

न जाने कैसी स्याही थी वो...
जो अब न दिखती है
और न मिटती है !!

||| फ़राज़ |||

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

दुआ !!!

मुझे अब्र कर दे या मुझे मीनार कर दे,
मौला मुझे इतना बुलंद किरदार कर दे,
इस ज़िन्दगी की धूप से बेशक़ मुझे जला,
मुझको ख़ुदा शजर तू सायदार कर दे !!!

अब्र= Cloud
शजर= Tree

||| फ़राज़ |||

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

बेनक़ाब !!!

इन्सान कहाँ बदल पाते हैं सीरत अपनी,
बारहा अज़ीज़ होते हैं बेनक़ाब होने तक !!!

||| फ़राज़ |||

मुशरिक |||

करता ख़ुदा का सजदा हूँ,
गर्दिश तेरी ज़हन में है..
न जाने किसका आशिक़ हूँ,
न जाने किसका मुशरिक मैं !!!

|||
फ़राज़ |||

सजदा= Bowing In Prayer So As To Touch The Ground With The Forehead
गर्दिश= Rotation, Circulation
ज़हन= Mind

मुशरिक= Polytheist, Idolater

अंजाम !!!

एक र्क़ कोरा है अभी मेरे अंजाम का ,
आ लिख दे तू एक नया हादसा दिल पर !!!

||| फ़राज़ |||

रविवार, 16 अप्रैल 2017

दूरियां !!!

हमक़दम हमदर्द भी हो ये लाज़मी तो नहीं..
दूरियां संवार देती हैं रिश्ते अक्सर !!!

||| फ़राज़ |||

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

क़ायदा !!!


अपनी ही ठोकरों से क़ायदा सीखेगा,
नस्ल-ए-आदम हैकरके ख़ता सीखेगा!

ये रंगीनियाँआसाईशेंये  फ़रेब ज़माने के,
शौक़-ए-लज़्ज़त में कितने गुनाह सीखेगा!


आलिम-ए-दीन भी अब तो करते हैं सियासत,
इनकी सोहबत में कौन सा ख़ुदा सीखेगा!


देखना तू भी तड़पेगा दिलनवाज़ी करके,
इश्क़ करके ही नुक़्साँ-ओ-नफ़ा सीखेगा!

तालीमगाहों में सीखेगा किताबी बातें,
ज़िन्दगी से लड़कर ही तजरबा सीखेगा!


शोर में भी अगर तू तन्हा सा रहता है,
तो ख़ामोशी में दिल की ज़बाँ सीखेगा!


जीतना है तो फ़िर तू हार से न डर,
हार कर ही जीतने का सलीक़ा सीखेगा!

स्याह रात के बाद सुबह होती है 'अल्फ़ाज़',
बार-हा ये सबक़ भी तो तू सुबह सीखेगा!

||| अल्फ़ाज़ |||

क़ायदा=  Regulations, Custom, Rule, Habit.
नस्ल-ए-आदम= Progeny Of Adam.
रंगीनियाँ= Ornateness.
आसाईशें= Comfort, Luxury.
फ़रेब=Deceit, Deception.
शौक़-ए-लज़्ज़त= Desire Of Enjoyment.
आलिम-इ-दीन= Scholars Of The Religion.
सियासतें= Politics.
दिलनवाज़ी= Heart-pleasing.
नुक़सान-ओ-नफ़ा= Loss and profit.
तालीमगाह= Seminary.
सलीक़ा= manner.
स्याह= Dark
बार-हा= Often

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

तक़ब्बुर !!!

न कर तक़ब्बुर अपनी शोहरत पर ऐ ग़ाफ़िल 
लोग तो लोग हैं, पत्थर को भी ख़ुदा कर देते हैं !


तकब्बुर (تکبر) = pride, arrogance, insolence, haughtiness
शोहरत (شہرت) = Renown, fame, rumour
ग़ाफ़िल (غافل) = negligent, neglectful


||| फ़राज़ |||

लोग !

क़ैद करते हैं परिंदों को पिंजरों में
आज़ादी-ए-वतन पर इतराते हैं लोग !

करते हैं फ़साद इबादतगाहों की ख़ातिर
इबादत में वक़्त कम ही बिताते हैं लोग !

अक्सर देते हैं हवाले मसरूफ़ियात के
अब लोगों के काम कहाँ आते हैं लोग !

करते हैं इश्तेहार लोगों की ख़ताओं का
अपने गिरेबां में झाँक कहाँ पाते है लोग !

सब कहाँ पाते हैं यहाँ आसमान नया
रास्ते औरों के ही अक्सर दोहराते हैं लोग !

करते हैं वक़ालत लोग इश्क़दारी की
भूल पाने का हुनर कहाँ बताते हैं लोग !

हर जिंदा बशर में ऐब ढूंढ लेने वाले
मय्यतों पर यहाँ सोज़ मनाते हैं लोग !

||| फ़राज़ |||

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

फ़रायज़ !!!

मेरा किरदार फ़रायज़ के मुताबिक़ है,
मैं हूँ वो ख़ार जो मुहाफ़िज़-ए-गुल है !

||| फ़राज़ |||

किरदार= Character
फ़रायज़= Duties
मुताबिक़= According
ख़ार= कांटा = Thorn
मुहाफ़िज़-ए-गुल= Protector of the rose. 

My character is according to my duties.
I’m the thorn who protects the rose. 

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

‘फ़राज़’

कुछ तो करम ख़ुदा ने तुझपे ‘फ़राज़’ रखा हैं,
इस दौर में भी तुझे अज़ीज़ों से नवाज़ रखा है !

||| फ़राज़ |||

माँ !

एक दुआ सी मिली मुझको बादल छूकर,
आज अब्र आया था माँ का आँचल छूकर !

||| फ़राज़ |||

रविवार, 9 अप्रैल 2017

तू न आया !!!

कोई आदाब-ए-वफ़ा न कभी निभाने आया,
तू जब आया तो फ़िर से छोड़ जाने आया !

जब तू आया तो एक नया ज़ख्म दिया,
कोई मरहम कभी तू न लगाने आया !

ये वक़्त-ए–आख़िर मेरा, और कंधे ग़ैरों के,
रस्म-ए-आख़िर भी न तू निभाने आया !

बहुत नाज़ था हमको वफ़ादारियों पर,
आज हम रूठे तो तू न मनाने आया !

||| फ़राज़ |||

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

फ़ितरत !!!

तूफ़ान से उलझकर 
सीखा है मैंने जलना,
खायी हज़ार ठोकर
आया है तब संभलना !

एक सिम्त जो हूँ डूबा,
एक सिम्त उग रहा हूँ,
फ़ितरत में हैं उजाले
सीखा न मैंने ढलना !

हर शब तू इम्तेहान ले,
मत भूल मेरी ज़िद को,
मैं शम्स हूँ सहर का
हर रोज़ है निकलना !

अपनी ही उलझनों से
सुलझाये कुछ हुनर हैं,
दरिया सा मुझको बहना,
पुरवाइयों सा चलना !

अहसास की ज़ुबान के
अल्फाज़ तर्जुमा है,
अग़ाज़ कुछ हैं लिखने,
अंजाम हैं बदलना !

शब= Night, रात
सिम्त= Directions, दिशा!
फ़ितरत= Nature, स्वभाव
शम्स= Sun, सूरज
दरिया= River, नदी

||| फ़राज़ |||


सोमवार, 3 अप्रैल 2017

फ़िर आज तुम नहीं हो !

एक ख़्वाब फ़िर जला है
फ़िर नींद है ख़फ़ा सी,
फ़िर आज रतजगा है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

फ़िर आज चाँद तन्हा
गुमसुम सा ढल गया है,
फ़िर रात बेवजह है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

मासूम सी तमन्ना 
फ़िर थक के सो गई है,
फ़िर ज़ख्म जागता है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

फ़िर अब्र घिर के आये
फ़िर हम न भीग पाए,
एक प्यास बेपनाह है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

फिर धड़कनों की लय पर
तेरा ही सिलसिला है,
दिल को यही गिला है
फ़िर आज तुम नहीं हो !

||| फ़राज़ |||