रविवार, 28 मई 2017

बेइख़्तियार !!!

बेइख़्तियार सा मेरा
दिल हो जाता है !
अजब इख़्तियार से तू
दाख़िल हो जाता है !

तसव्वुर-ए-जां पर
हर्फ़ों को ख़र्च करता हूँ !
वो ग़ज़ल बनकर
कामिल हो जाता है !

इश्क़ में दीवानगी के
हज़ार इल्ज़ाम मिले !
आलम-ए-फ़िराक़ में दिल
क़ाबिल हो जाता है !

तेरी तलाश में अक्सर
आँखें बंद कर लेता हूँ !
तू ख़याल सा आँखों में
शामिल हो जाता है !

क्यूँ भला हम रुख़
मयख़ानों का करें !
ख़ुमार तेरे ख़यालों से
हासिल हो जाता है !

|||फ़राज़|||

कामिल= Perfect, Complete, Accomplish, Entire
तसव्वुर--जां= Imagining Of The Beloved
आलम-ए-फ़िराक़= Condition/state of Separation 

मंगलवार, 23 मई 2017

ज़िन्दगी !!!

कभी भागती
कभी थमी-थमी सी लगती है !
ज़िन्दगी आजकल
अजनबी सी लगती है !

दिल ने आज
तेरी उम्मीद छोड़ दी शायद !
सांस भी ज़रा
थमी-थमी सी लगती है !

तेरे ख़याल आज
धुंधले- धुंधले से लगते हैं !
तेरी तस्वीर आज
लाज़मी सी लगती है !

वक़्त शायद
बहुत तेज़ गुज़रा होगा !
घड़ियाँ दीवार पर
थकी-थकी सी लगती है !

तूने जाते हुए
आज न मुड़कर देखा !
ये मुलाक़ात शायद
आख़िरी सी लगती है !

देर कर दी
तूने आने में फ़राज़’,
अपनी सी वो निगाह
अब अजनबी सी लगती है !

||| फ़राज़ |||


लाज़मी = compulsory, essential

रविवार, 21 मई 2017

हक़ीकत !!!

क्या हक़ीकत है जिस्म की रूह के बग़ैर,
किसी मय्यत को कन्धा कभी लगाकर देखो !
 
पैबंद लगा सही मगर दुपट्टा सर पर रहता है,
अदब, मुफ़्लिस मकानों में कभी जाकर देखो !
 
कुछ तो हुनर ख़ुदा ने तुझको भी दिया होगा,
सोच के जाले कभी ज़हन से हटाकर देखो !
 
तेरे सारे गुनाह एक पल में धुल जायेंगे,
किसी प्यासे को कभी पानी पिलाकर देखो !
 
शायद कोई शिक़ायत है तक़दीर से तुम्हें,
दर्दमंदों को कभी गले से लगाकर देखो !
 
लौटकर आ जायेंगे अगर तेरे अपने होंगे,
रूठे हुओं को कभी दिल से बुला कर देखो !


||| फ़राज़ |||

पैबंद= Patchwork
मुफ़्लिस=Poor, Indigent.

शनिवार, 20 मई 2017

ऐ दिल !!!

फ़िर आज उसने दुआ की है शायद,
ज़िन्दगी फ़िर शादमां सी लगती है !

पलकें झपककर उसने हर बात कह दी,
रंजिशें आज सब बेवजह सी लगती हैं !

तुझसे ही मुक़म्मल है हर सफ़र मेरा,
तू है वाहिद, पर कारवां सी लगती है !

जब से गुज़रा है तू मेरी गलियों से,
मुझको ये ज़मीं कहकशां सी लगती है !

बड़े एहतराम से सोचा कर उसको ऐ दिल,
उसकी आँखें मुक़म्मल दुआ सी लगती हैं !

||| फ़राज़ |||
शादमां= Happy
रंजिशें= Hostility, Ill-Will
मुक़म्मल= Complete
वाहिद= Single, Lone, One
कहकशां= The Galaxy, The Milkyway
एहतराम= Respect, Honor.

बुधवार, 17 मई 2017

पैग़म्बरी !!!


महज़ मुनाफ़े के लिए
नहीं होते सभी रिश्ते,
सूरज कभी ज़मीनों से
उजालों का हिसाब नहीं करता !

सुलगते दिल को जब कर दिया
उजालों का जरिया हमने,
अब जलता हुआ दिल
अंधेरों का अस्बाब नहीं बनता !

तू आने हाथों से गढ़ता है
ख़ुद अपनी ही बरबादियाँ,
पानी कभी ख़ुद-ब-ख़ुद
सिफ़त-ए-शराब नहीं बनता !

ये उसे गुमान-ए-हस्ती,
ये वहम उसे पैग़म्बरी का,
अब कभी वो ख़ुदपरस्त
रिश्तों में आदाब नहीं रखता !

इसे शिर्क न समझ ‘फ़राज़’
कि हद है ये इबादत की,
जब वो ज़हन में हो तो मैं
सजदों का हिसाब नहीं रखता !

||| फ़राज़ |||

बुधवार, 10 मई 2017

दिल-ए-मुफ़्लिस !!!


क्यूँ न दर्द को ही अब हमसफ़र कर लें
एक दर्द ही तो है जो छोड़ कर जाता नहीं !

तेरी पर्देदारियों का एहतराम रखता है
इल्ज़ाम दिल तुझपर कभी लगाता नहीं !

रखता है मुनव्वर सदा तेरी यादों से
शमा-ए-उम्मीद दिल कभी बुझाता नहीं !

एक हम कि हर बार ही तेरी ज़िद करते हैं
एक तू कि ग़लतियां कभी दोहराता नहीं !

यूँ तो नज़रों से है फ़ासला अब सदियों का
ख़ुदाया दिल से आखिर वो क्यूँ जाता नहीं !

क्या ख़बर थी की वो करता है दिल्लगी
वादे हज़ार करता है मगर निभाता नहीं !

तेरी राहों के हवाले ही अब कर दूँ  ज़िन्दगी
बराह-ए-रास्त दूजा अब और नज़र आता नहीं !

दिल-ए-मुफ़्लिस तू अब न रूठा कर
मुद्दतें गुजरीं कि अब वो मनाता नहीं !

||| फ़राज़ |||

पर्देदारियां= Secrecies.
इल्ज़ाम= Blame
मुनव्वर= Illuminated.
शमा-ए-उम्मीद= Candle of hope.
ज़िद= Insistence.
सदियां= Ages, Centuries.
ख़ुदाया= God.
दिल्लगी= Amusement, Merriment.
बराह-ए-रास्त= Directing, Guiding.
दिल-ए-मुफ़्लिस= Poor Heart. 
मुद्दत= A long time/period



रविवार, 7 मई 2017

बचपन !!!

भरा है बटुआ पर मुफ़्लिसी नहीं जाती,
फोड़ कर गुल्लक अमीर हो जाया करते थे !
जाने अब क्यूँ अजनबी से लगते हैं सितारे,
गिन-गिन कर जिनको हम रात बिताया करते थे !

एक पेंसिल के दो टुकड़े कर देते थे,
मासूम दोस्ती कुछ यूँ निभाया करते थे !
जाने कब चुक गईं वो टॉफियाँ, जो तुम्हारे साथ,
दांत से काट कर आधी-आधी खाया करते थे !

इन दानिशवरों से वो नादान थे बेहतर,
रूठने पर जो हमको मनाया करते थे !
तरक्की की रफ़्तार में सूख गई वो बहती नदी,
स्कूल से भाग कर जिसमें नहाया करते थे !

सुनते हैं अब वहां कोई पेड़ नहीं बचा,
आम जिस बाग़ से हम चुराया करते थे !
मेरे हाथों का सहारा अब वो ढूढ़ते हैं,
जिनकी ऊँगली पकड़कर हम स्कूल जाया करते !

||| फ़राज़ |||


बटुआ= Wallet
मुफ़्लिसी= Poverty
गुल्लक= Piggy bank
अमीर= Rich
दानिशवर= Scholar, Intellectual.
नादान= Innocent
तरक्की= Development
बाग़= Garden

गुरुवार, 4 मई 2017

राब्ता !!!

कल रात तुम फ़िर आये थे,
ख़्वाब था शायद,
पर अच्छा था !

राब्ता ये ख़्वाबों का
जैसे बुलबुला सा पानी का !

तुम भी कुछ-कुछ नींद के जैसे हो,
एक बार रूठ जाते हो
तो फ़िर जल्दी नहीं आते हो!

मैं रोज़ बांधता हूँ
उम्मीद की एक गिरह ,
तुम दुनियादारी की दलीलें दे कर
खोल देते हो,
रिश्तों की सारी गिरहें !

ख़्वाबों में न आया करो,
कि अब ख़्वाब टूटने से
राब्ता भी टूट जाता है !

|||फ़राज़|||



राब्ता = Contact.
गिरह= Knot, Joint.
दुनियादारी= Worldliness.
दलीलें= Excuses.