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गुरुवार, 4 मई 2017

राब्ता !!!

कल रात तुम फ़िर आये थे,
ख़्वाब था शायद,
पर अच्छा था !

राब्ता ये ख़्वाबों का
जैसे बुलबुला सा पानी का !

तुम भी कुछ-कुछ नींद के जैसे हो,
एक बार रूठ जाते हो
तो फ़िर जल्दी नहीं आते हो!

मैं रोज़ बांधता हूँ
उम्मीद की एक गिरह ,
तुम दुनियादारी की दलीलें दे कर
खोल देते हो,
रिश्तों की सारी गिरहें !

ख़्वाबों में न आया करो,
कि अब ख़्वाब टूटने से
राब्ता भी टूट जाता है !

|||फ़राज़|||



राब्ता = Contact.
गिरह= Knot, Joint.
दुनियादारी= Worldliness.
दलीलें= Excuses.