शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

जब आप बुलाया करते थे !

जब शाम ढले तारे तकते,
एक सोच में डूबे रहते थे !
उसके फ़ितूर में अलसाये,
हम रात से सुबह करते थे !

जब नाम को तेरे दोहराते,
एक नींद से बैर लिया हमने !
और जागी-जागी आँखों से,
हम ख़्वाब सजाया करते थे !

एक उम्र में लाखों लम्हें हैं,
जब आप पुकारा करते था !
हर सरहद तब थी बेमानी,
जब आप बुलाया करते थे !

एक वक़्त भी ऐसा आया था,
जब हमसे उनको निस्बत थी !
जो ख़्वाब थे मेरी नज़रों में,
वो उनके दिल की मन्नत थी !

जब छुप के दुनियावालों से,
वो चाँद फ़लक़ पर आता था !
हम मुंडेरों के पीछे से ,
हर शाम नज़ारा करते थे !

तब जलने में भी ठंडक थी,
जब आप सताया करते थे !
बेवजह अक्सर रूठे हम,
      जब आप मनाया करते थे !

सोमवार, 23 जनवरी 2017

वो राह बदल देता है !

दर्द मेरा वो ख़बरों की तरह पढ़ता है,
र्क़ बातों के वो अक्सर पलट देता है !

आज भी मिलता है मगर फ़नकार की तरह,
मेरी शिक़ायतें सुनकर वो बात बदल देता है !

अब मेरी खैर भी वो दुआ में नहीं करता,
वो लिबासों की तरह दुआ भी बदल देता है !

मुझपर इख़्तियार रखता है और ख़ुद पर भी,
ख़ुदा सबको कहाँ इतना हुनर देता है !

हर शाम इरादा है उसे भूल जाने का,
वो ख़्वाब में आकर मेरी सोच बदल देता है !

ज़माने को भी मुझसे कोई शिक़ायत न रही,
जबसे मुझे देख कर वो राह बदल देता है !

फ़राज़...

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

शायद वो मेरे जैसा है !

वो तरकीबों की कंघी से,
उलझन की गिरहें सुलझाये !
मेरी धुंधलाई नज़रों को,
वो ख़्वाब नए से दे जाये !

वो सुस्त-थके से क़दमों को,
मंज़िल की राह दिखाता है !
जब कोई इरादा सर्द पड़े,
वो आंच सा बन के छूता है !

परवाज़ मुझे वो देता है,
वो पंख नए से लाता है !
वो मन की बोली बोलता है,
शायद वो मेरे जैसा है !

वो बेफ़िक्री का ज़रिया है,
दिल की फ़िक्रें झुठलाता है !
जब बोझ सा कोई दिल पर हो,
वो दिल हल्का कर जाता है !

बेरंग सी मेरी दुनिया में,
वो रंग जूनून के भरता है !
मरहम रखता है लफ़्ज़ों में,
वो ज़ख्मों को भर देता है !

वो मेरी ज़ुबान समझता है,
वो ख़ामोशी भी पढ़ लेता है !
वो अनजाना सा लगता है,
फ़िर भी अपना सा लगता है !

फ़राज़...

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

तस्कीन



      बरसों तलक खोलता रहा दर्द की परतें,
आज तेरी बातों को मैं मरहम कर लूँ !
बन के आया है तू घने से सावन जैसा,
क्यों न आज रूह को मैं अपनी तर लूँ !

ये तन्हा आग़ोश मेरे दिल में चुभता है,
टूट जाना अगर मैं बाँहों में भर लूँ !
कभी मेरी दीवानगी का तक़ाज़ा भी समझ,
तू मुझमें समाता है मैं सांस अगर लूँ !

एक तस्कीन है वाबस्ता तेरे नाम के साथ,
दिल मेरा बहल जाता है मैं नाम अगर लूँ !
मुसाफ़िर मेरी राहों का आ गया है वापस,
क्यों न ज़िन्दगी को भी हमसफ़र कर लूँ !

फ़राज़...

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

फ़िर कभी !

तुम ख़्वाब बन के आओ
आँखों में आज रात
इस रात की सुबह को
ढूंढेंगे फ़िर कभी !

बाद मुद्दत उलझा है
तेरी ज़ुल्फ़ से ख़याल,
मेरी उलझनों की गिरहें
खोलेंगे फ़िर कभी !

तू चाँद बनके रात में
आया है फ़लक़ पर,
भर लें तुझे निगाह में
सो लेंगे फ़िर कभी !

बस आज की रात है
कुछ देर ठहर जाओ,
छोड़ जाने का इरादा
कर लेंगे फ़िर कभी !

रह जाओ आग़ोश में ज़रा 
की मिल जाये तसल्ली,
दुश्वारियों का तक़ाज़ा
कर लेंगे फ़िर कभी !

भर लूँ तुझे निगाह में
कल की किसे ख़बर,
इन लम्हों का तजुर्बा
बाँटेंगे फ़िर कभी !

क्या गिला तुझसे करूँ
छोटी सी है ज़िन्दगी,
तेरी नादानियों का शिक़वा
कर लेंगे फ़िर कभी !

|||फ़राज़|||

मुद्दत= A long time, 

गिरहें= A knot, joint, knuckle.
फ़लक़= Sky, Heaven, Firmament.
आग़ोश= Embrace
दुश्वारियों= Difficulties.
तक़ाज़ा= Demand, Pressing Settlement, Urge.
तजुर्बा= Experience.
गिला= Complaint, Reproach
शिक़वा= Complaint


शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

ख़त

आज तेरा ख़त जला दिया मैंने,
राख़ के पुर्ज़े से हुए अहसास मेरे!

राख़ के रंगत से स्याह दिखते हैं,
क्या रंग लाये हैं अल्फाज़ तेरे!

बोझ से आज पलकें बंद कर ली मैंने
बरसों तलक उठाये हमने नाज़ तेरे!

तुझपे यकीं तो था, इल्म-ए-ग़ैब न था
आहिस्ता आहिस्ता खुले हैं राज़ तेरे!

आज सफ़र का रुख़ कर लेते हैं,
बहुत मुन्तज़िर रह लिए फ़राज़ तेरे!

फ़राज़....