दर्द मेरा
वो ख़बरों की तरह पढ़ता है,
वर्क़ बातों
के वो अक्सर पलट देता है !
आज भी मिलता
है मगर फ़नकार की तरह,
मेरी शिक़ायतें सुनकर वो बात बदल देता है !
अब मेरी खैर
भी वो दुआ में नहीं करता,
वो लिबासों
की तरह दुआ भी बदल देता है !
मुझपर इख़्तियार रखता है और ख़ुद पर भी,
ख़ुदा सबको
कहाँ इतना हुनर देता है !
हर शाम
इरादा है उसे भूल जाने का,
वो ख़्वाब
में आकर मेरी सोच बदल देता है !
ज़माने को भी मुझसे कोई शिक़ायत न रही,
जबसे मुझे देख कर वो राह बदल देता है !
फ़राज़...