रविवार, 9 सितंबर 2018

दर्द के मारे

जो दर्द के मारे होते हैं,
हमदर्द हमारे होते हैं !

जब भंवर में कश्ती आती है,
तिनको के सहारे होते हैं !

ये अश्क हैं दिल का ज़ाइक़ा,
मीठे कभी खारे होते हैं !

जब इश्क़ किसी से होता है,
गर्दिश में सितारे होते हैं !

लहरों का ठिकाना कोई नहीं,
कश्ती के किनारे होते हैं !

वो जीत नहीं सकते दुनिया,
जो खुद से हारे होते हैं !

दिल में अगर हो कोई जुनूँ,
आँखों में शरारे होते हैं !

'फ़राज़नज़र बना के रख,
क़िस्मत के इशारे होते हैं !

||| फ़राज़ ||| 

हमदर्द= A Sympathizer, A Fellow, Sufferer Partner In Adversity
भंवर= Vortex, Whirlpool
अश्क= Tears
ज़ाइक़ा= Flavor, Sense Of Taste, Savor
खारा= Salty, Brackish
गर्दिश= Revolution, Circulation, Misfortune
कश्ती= A Boat, A Ship,
किनारा= Coast, Sea-Shore, Bank
जुनूँ= Frenzy/ Madness/ Infatuation
शरारा= Spark Of Fire, A Flash, A Gleam
क़िस्मत= Fate, Fortune, Destiny
इशारा= Gesture, Sign, Hint

गुरुवार, 6 सितंबर 2018

नसीहत


मुद्दई भी हमीं, मुल्ज़िम भी हमीं,
ये रस्म-ए-अदातल ठीक नहीं !

मुंसिफ़ भी वही, मुजरिम भी वही,
इंसाफ़ की चाहत ठीक नहीं !

हर ख़ता नहीं उस निगाह की,
अपनी भी तो नीयत ठीक नहीं !

बेईमान ये दिल हो जाता है,
जलवों की ये रिश्वत ठीक नहीं !

एक मोड़ पे मुड़ जायेगा वो,
राही से मोहब्बत ठीक नहीं !

ठोकर के सिवा क्या पायेगा,
पत्थर की इबादत ठीक नहीं !

दो तरह की बातें करती है,
मरकज़ की हुकूमत ठीक नहीं !

आक़िल है तो तू ख़ामोश ही रह,
जाहिल से जहालत ठीक नहीं !

सच नीम सा कड़वा होता है,
बिन माँगे नसीहत ठीक नहीं !

हर राज़ बयाँ कर देता है,
'फ़राज़' की आदत ठीक नहीं !

||| फ़राज़ ||| 

मुद्दई = Petitioner, Appellant
मुल्ज़िम = Accused
रस्म-ए-अदातल = Custom/ Ritual Of The Court
मुंसिफ़ = Judge
मुजरिम = Guilt, Criminal, Sinner, Convict
इंसाफ़ = Justice
ख़ता = Fault, Mistake, Sin
निगाह = Look, Glance
नीयत = Intention
बेईमान = Cheat, Sinner
जलवा = Luster, Splendor, Display, Show
रिश्वत = Bribe
राही = Traveler
सिवा = Except, But, Over And Above
इबादत = Worship
मरकज़ = Center, Central
हुकूमत = Government
आक़िल = Wise, Intelligent
ख़ामोश = Silent, Quite
जाहिल = Illiterate
जहालत = Illiteracy, Ignorance, Boorishness
नसीहत = Advice
राज़ = Secret
बयाँ = Divulge, Statement
आदत = Habit

बुधवार, 5 सितंबर 2018

उस्ताद


ज़िन्दगी की ईमारत की बुनियाद की तरह,
बेहतर कोई तोहफ़ा नहींउस्ताद की तरह !

||| फ़राज़ |||

ईमारत = Building 
बुनियाद= Foundation, Base
तोहफ़ा = Gift
उस्ताद = Teacher, Mentor

सोमवार, 3 सितंबर 2018

मंज़िल


दूर सही, एक मंज़िल है,
धुंधला ही सही, एक साहिल है !

कुछ भी नहीं है नामुमकिन,
एक राह ज़रा सी मुश्किल है !

दुनिया की फ़िक्र में ऐ इंसाँ,
तू ख़ुद से क्यूँ इतना ग़ाफ़िल है !

मत हार, लड़ाई बाक़ी है,
जीता न सही, तू क़ाबिल है !

चादर में समेटो पैरों को,
क़िस्मत में था जितनाहासिल है !

जहाँ कोई क़दम न पहुँचा हो,
फ़राज़की वही तो मंज़िल है !

||| फ़राज़ |||

मंज़िल= Stage, Destination
साहिल= The Sea-Shore, Coast, Beach
नामुमकिन= Impossible
फ़िक्र= Concern, Thought
इंसाँ= Human, Mankind
ग़ाफ़िल= Negligent, Oblivious
क़ाबिल= Able, Competent, Deserving
हासिल= Gain, Profit

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

मनचला

मैं जब से बे-वजह सा हो गया हूँ,
निहायत ख़ुशनुमा सा हो गया हूँ !

मुझे सब मांगने लगे हैं,
मैं जब से दुआ सा हो गया हूँ !

ख़िज़ाँ की धूप में झुलस कर,
शजर एक सायबाँ सा हो गया हूँ !

सभी को मुआफ़ जब से किया है,
मैं बाद-ए-सबा सा हो गया हूँ !

नहीं सुनता मैं अपने ज़हन की,
ज़रा सा मनचला सा हो गया हूँ !

न अपनी छत न अपनी ज़मीं है,
शहर में एक मकाँ सा हो गया हूँ !

पुरानी बेड़ियों को तोड़ कर के,
‘फ़राज़’ मैं फ़िर नया सा गया हूँ !

||| फ़राज़ |||

बे-वजह= Causeless, Without-Cause
निहायत= Very Much, Extreme
ख़ुशनुमा= Pleasant To Sight
ख़िज़ाँ= Autumn, Decay
शजर= Tree
सायबाँ= Shade, Shelter
मुआफ़= Excuse, Absolve, Exempt
बाद-ए-सबा= Morning Breeze, The Zephyr, A Refreshing Wind
ज़हन= Mind
मकाँ= House, Home
बेड़ियाँ= Chains

सोमवार, 27 अगस्त 2018

सावन

छू जाओ मेरे ज़ख्मों को मरहम की तरह,
बरस जाओ मुझपर घने सावन की तरह !

तेरे ख़याल में इतवार की सी फ़ुर्सत है,
तू पहली बारिश, तू घर के आंगन की तरह !

ये और बात है कि निगाह से दूर रहते हो,
दिल में सदा रहते हो धड़कन की तरह !

दुनिया से बे-फ़िक्र हो जाऊं मैं फ़िर से,
लौट आओ कभी मेरे बचपन की तरह !

रूह प्यासी है किसी सूखे हुए पत्ते की तरह,
कभी मुझपे ठहर जाओ शबनम की तरह !

छू जाओ मेरे ज़ख्मों को मरहम की तरह,
बरस जाओ मुझपर घने सावन की तरह !

||| फ़राज़ |||
















दोस्तों, इस बार आप लोगों की कोई भी एंट्री सेलेक्ट नहीं की जा रही है ! मुझे उम्मीद है की अगली बार आप लोग बेहतर एंट्रीज़ ले कर आयेंगे ! इस बार अल्फ़ाज़ की एक कोशिश पेश की जा रही है !

क्यूँ न खुद से ही मोहब्बत कर के देखें

शनिवार, 25 अगस्त 2018

तफ़्सील


सवालों को यूँ हल कर देता हूँ,
ख़यालों को ग़ज़ल कर देता हूँ !

दुनिया से जो मैंने सीखा है,
काग़ज़ पे नक़्ल कर देता हूँ

ठोकर की तराशों से ख़ुद को,
मैं ताजमहल कर देता हूँ !

किरदार चराग़ सा है मेरा,
एक नूर मैं जल कर देता हूँ !

होता है वही जो लिखा है,
मैं तो बस अमल कर देता हूँ !

हक़ बात पे क़ाएम रहता हूँ,
तजवीज़ संभल कर देता हूँ !

'फ़राज़मैं हूँ एक आईना,
तफ़्सील मुकम्मल देता हूँ !

||| फ़राज़ |||

सवाल= Questions, Query
ख़याल= Thought
काग़ज़= Paper
नक़्ल= Narrative, Copying,
ठोकर= Obstacle, Kick, Stumble
तराश= Chisel, Carver
किरदार= Character, 
चराग़= An Oil Lamp
नूर= Light, Splendour
अमल= Act
हक़= Truth
क़ाएम= Stay, Permanence
तजवीज़= Suggestion
आईना= The Mirror
तफ़्सील =  Detail, Analysis
मुकम्मल= Complete, Perfect