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शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

मनचला

मैं जब से बे-वजह सा हो गया हूँ,
निहायत ख़ुशनुमा सा हो गया हूँ !

मुझे सब मांगने लगे हैं,
मैं जब से दुआ सा हो गया हूँ !

ख़िज़ाँ की धूप में झुलस कर,
शजर एक सायबाँ सा हो गया हूँ !

सभी को मुआफ़ जब से किया है,
मैं बाद-ए-सबा सा हो गया हूँ !

नहीं सुनता मैं अपने ज़हन की,
ज़रा सा मनचला सा हो गया हूँ !

न अपनी छत न अपनी ज़मीं है,
शहर में एक मकाँ सा हो गया हूँ !

पुरानी बेड़ियों को तोड़ कर के,
‘फ़राज़’ मैं फ़िर नया सा गया हूँ !

||| फ़राज़ |||

बे-वजह= Causeless, Without-Cause
निहायत= Very Much, Extreme
ख़ुशनुमा= Pleasant To Sight
ख़िज़ाँ= Autumn, Decay
शजर= Tree
सायबाँ= Shade, Shelter
मुआफ़= Excuse, Absolve, Exempt
बाद-ए-सबा= Morning Breeze, The Zephyr, A Refreshing Wind
ज़हन= Mind
मकाँ= House, Home
बेड़ियाँ= Chains

रविवार, 15 अप्रैल 2018

!!! तलाश !!!

जागती आँखों से एक सपना ढूँढता हूँ,
जो पराया हो गया, वो अपना ढूँढता हूँ !

इश्क़ भी करता हूँ, सुकून भी चाहता हूँ,
सहरा के सफ़र में मैं सायबाँ ढूँढता हूँ !

मैं नहीं करता किसी मख़्लूक़ को सजदा,
ख़ुदाओं के मजमे में इंसान ढूँढता हूँ !

चलो बताता हूँ कि ख़ुदा की हक़ीकत क्या है,
वालिदैन नज़र आते हैं, जब ख़ुदा ढूंढता हूँ !

जब से जाना कि कोई बे-वजह नहीं मिलता,
तब से हर मुलाक़ात में नफ़ा ढूँढता हूँ !

बाज़ार की बोतलों से मेरी प्यास नहीं बुझती.
अपने आँगन में अपना कुआँ ढूँढता हूँ !

ग़म न कर जो कोई इल्ज़ाम मैं तुझको दे दूँ,
ऐ बेवफ़ा ग़ज़ल, मैं तेरा क़ाफ़िया ढूंढता हूँ !

आप ही ढूँढिये जी-हुज़ूरी करने वाले,
'फ़राज़' मैं तो दुश्मन भी खरा ढूँढता हूँ !

||| फ़राज़ |||



सुकून= Peace, Tranquility.
सहरा= Desert
सायबाँ= Shade, Shelter
मख़्लूक़= Creation Of God
ख़ुदाओं= Gods
मजमा= Crowd
हक़ीकत= Reality
वालिदैन= Parents
बे-वजह= Without Cause
नफ़ा= Profit.
ग़म= Sorrow, Grief.
इल्ज़ाम= Accusation, Blame
क़ाफ़िया= Rhyme, The Last Or Second Last Words Of Each Verse Is Called Qafiya
जी-हुज़ूरी= Flattering, Yes Man; Sycophancy; "Yes Your Honor, 
खरा= Real, Genuine