शुक्रवार, 4 मई 2018

!!! सदमा !!!

अपनी हद से अभी तक तो गुज़रा मैं नहीं हूँ,
थक सा गया हूँ पर अभी ठहरा मैं नहीं हूँ !

रोता हूँ तो रोने दो मेरा ग़म है तुम्हें क्या,
मुझको यूँ न देखो कि तमाशा मैं नहीं हूँ !

बेशक मैं तेरी सोच का हिस्सा हूँ आज भी,
अफ़सोस कि तेरे जिस्म का साया मैं नहीं हूँ !

चाहूँ तो क्या मुझे भी कोई और न मिले?
 बेवफ़ा, मगर तुझसा बेवफ़ा मैं नहीं हूँ !

अक्सर मैं भीगता नहीं बारिश में इन दिनों,
ज़िंदा तो हूँ पर अब उतना ज़िंदा मैं नहीं हूँ !

अक्सर वो मुझे छू के चला जाता है वापस,
उस आवारा लहर का तो किनारा मैं नहीं हूँ !

क्यूँ लग गई है मेरी ख़ुशियों को बद-नज़र,
हँसता तो हूँ पर अब दिल से हँसता मैं नहीं हूँ !

न जाने किस दर्द का मुन्तज़िर मैं हूँ 'फ़राज़',
सदमा तो है पर अब तलक रोया मैं नहीं हूँ !

||| फ़राज़ |||

हद= Limit
ग़म= Sorrow, Grief
तमाशा= Show, Entertainment, Exhibition, Amusement
बेशक= Doubtless
अफ़सोस= Ah!, Alas!, Dejection
साया = Shadow
बेवफ़ा  = Treacherous, Unfaithful. 
बद-नज़र  = Evil Eye.
मुन्तज़िर = Awaiting.
सदमा = Shock, Calamity

बुधवार, 2 मई 2018

आतिश-ए-इश्क़ !!!

क्या ख़ूब बला है ये आतिश-ए-इश्क़,
कि जलने में भी मज़ा, और जलाने में भी !

कहें तो कैसे कहें कि बात है दिल की,
जिसे कहने में भी मज़ा और छुपाने में भी !

मज़ा इसमें भी है कि उनको जलाया जाए,
कि जिनसे रूठने में भी मज़ा, जिनको मनाने में भी !

दिल को खिलौना ही समझ कर खेल लीजिये,
आपसे तो जीतने में भी मज़ा, और हार जाने में भी !

तेरे इश्क़ की हर शर्त है मंज़ूर हमको,
जिन्हें तोड़ने में भी मज़ा और निभाने में भी !

ये इश्क़ का नशा है, हर हाल में मज़ा है,
है दिल्लगी में भी मज़ा और दिल के लगाने में भी !

दिल के सौदे में कभी 'फ़राज़' का ख़सारा न हुआ,
है मिलन में भी मज़ा, और बिछड़ जाने में भी !

||| फ़राज़ |||

आतिश-ए-इश्क़= Fire Of Love
शर्त= Condition, 
मंज़ूर= Accept
हाल= State, Condition,
दिल्लगी= Amusement, Merriment
ख़सारा= Loss

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

!!! दिल-ए-मुन्तज़िर !!!

मुझे बे-वजह सी लगती है ये बारिश की रातें,
हक़ीक़त न सहीख़याल  बनके चले आओ !

क्या कमी है दिल को, दिल समझ नहीं पाता,
जवाब न सही, तुम सवाल बनके चले आओ !

ये तन्हाईयाँ जिस्म में काँटों की तरह चुभती हैं,
मरहम न सहीशामिल-ए-हाल बनके चले आओ !

कब तलक जलता रहूँ मुसलसल मैं तपिश में,
उरूज न सही, मेरा ज़वाल बनके चले आओ !

दर्द की तासीर भी तो अब कम हो चली है,
सुकून न सही,तुम मलाल बनके चले आओ !

दिल-ए-मुन्तज़िर को 'फ़राज़' आराम तो आये,
वस्ल मुम्किन नहीं, तो इंतिक़ाल बनके चले आओ !

||| फ़राज़ |||

बे-वजह= Without Cause/Reason
हक़ीक़त= Reality
ख़याल= Thought, Imagination
तन्हाईयाँ= Loneliness
मरहम= Ointment
शामिल-ए-हाल= Associated With Present Circumstances.
मुसलसल= Continuous, 
तपिश= Heat, Scorch, Agitation.
उरूज= Rising, Exaltation, Ascension
ज़वाल= Decline
तासीर= Effect, Influence
सुकून= Peace, Tranquility
मलाल= Regret, Sorrow, Grief.
दिल-ए-मुन्तज़िर = The Expectant Heart
वस्ल = Union Or Meeting (Typically Used In The Context Of A Meeting Of Lovers)
मुम्किन = Possible
इंतिक़ाल= Death, Migration, 

शनिवार, 28 अप्रैल 2018

!!! दिल-ए-मोमिन !!!

सवाल ही सवाल रहे, कोई जवाब न रहे,
मेरी नींदों में बाक़ी कोई ख़्वाब न रहे !

ये बस्ती तेरे बग़ैर कुछ ऐसी लगती है,
जैसे गुलशन में बाक़ी कोई गुलाब न रहे !

इतना बेज़ार सा है ये दिल-ए-मोमिन मेरा,
जैसे इबादत में बाक़ी कोई सवाब न रहे !

चाहे कुछ न कमा पाऊं मैं जन्नत की ख़ातिर,
मगर ज़िन्दगी पे बाक़ी कोई हिसाब न रहे !

मुफ़्लिसी इतनी भी पेश न आये कभी दिल को,
कि निगाहों में बाक़ी कोई सराब न रहे !

इतना ख़ाली है मेरा दिल तेरी याद के बग़ैर,
जैसे मय-ख़ाने में बाक़ी कोई शराब न रहे !

कि फ़िर कौन याद करेगा अल्लाह को तड़पकर,
अगर ज़िन्दगी में बाक़ी कोई अज़ाब न रहे !

ज़रूरी है कि नज़र और नज़रिया ठीक हो,
चाहे औरत पे बाक़ी कोई हिजाब न रहे !

ख़ुदारा 'फ़राज़' को तू इतना मुकम्मल कर दे,
कि मेरे किरदार पे बाक़ी कोई नक़ाब न रहे !

||| फ़राज़ |||

बग़ैर= Without, Except
गुलशन= Flower Garden, Rose Garden
बेज़ार= To Be Sick Of
दिल-ए-मोमिन= Believer/ Pious
इबादत= Prayers, Adoration
सवाब= Reward Of Good Deeds
ख़ातिर= For The Sake Of
हिसाब= Account, Calculation
मुफ़्लिसी= Poverty
पेश= Happen
सराब= Mirage, Illusion
मय-ख़ाना= Bar, Tavern
अज़ाब= Torment, Agony
नज़रिया= Ideology, Perspective
हिजाब= Hijaab Means A Cover Of A Woman Over The Whole Body.
ख़ुदारा=  O God.
मुकम्मल= Complete, Perfect
किरदार= Character
नक़ाब= Is The Covering Of The Face And Hands.

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

ग़ज़ल-ए-फ़राज़ !!!

फ़र्क़ पड़ता है क्या कि सज़ा क्या है,
इश्क़ बदनाम न हो तो मज़ा क्या है !

रतजगे, तन्हाई, मलाल और तड़प,
हमको मालूम है कि वफ़ा क्या है !

अरमान दिल में तो कई बाक़ी हैं,
 ज़हन, तेरा मशवरा क्या है !

इश्क़ करना है तो फ़िर ये न सोचिये,
कि नुक़सान क्या, और नफ़ा क्या है !

इश्क़ गुनाह है तो हम मुजरिम बेहतर,
इश्क़ मर्ज़ है तो फिर शिफ़ा क्या है !

आज फ़िर हूँ मैं तेरा तमन्नाई हूँ,
इस दफ़ा मेरा इम्तिहाँ क्या है !

जब दिल टूटेगा तो ख़ुद समझ जाओगे,
इश्क़ मिसरा है तो क़ाफ़िया क्या है !

ये ग़ज़ल-ए-फ़राज़ नज़ीर इस बात की है,
कि हादिसा मेरे दिल पे गुज़रा क्या है !

||| फ़राज़ |||

फ़र्क़= Difference.
रतजगा= Vigil,  Keeping Awake All Night
तन्हाई= Loneliness
मलाल= Regret
तड़प= Agitation Of Mind And Body
मालूम= Known
वफ़ा= Faithfulness, Loyalty
अरमान= Desire, Longing
बाक़ी= Remaining, Perpetual
ज़हन= Mind
मशवरा= Advice, Counsel
नुक़सान= Loss, Damage
नफ़ा= Profit
गुनाह= Sin, Crime
मुजरिम = Sinner, Culprit.
बेहतर= Better
मर्ज़= Illness, Sickness
शिफ़ा= Heal, Cure
तमन्नाई= Wisher, Desirous, 
दफ़ा= Time
इम्तिहाँ= Exam, Trail, Test
मिसरा= One Line Of A Couplet Or Verse.
क़ाफ़िया= Rhyme, The Last Or Second Last Words Of Each Verse Is Called Qafiya
ग़ज़ल-ए-फ़राज़= Gazal Of Faraz
नज़ीर= Precedent, Example.
हादिसा= Accident, Calamity, Misfortune
गुज़रा= Passed, Gone

सोमवार, 23 अप्रैल 2018

हो सकता है !

पत्थर भी तराशा जाए, तो ख़ुदा हो सकता है !
तू तो इन्सान है, सोच तू क्या से क्या हो सकता है !

बस यही सोच कर मैंने तुझे माफ़ कर दिया,
तू भी इंसान है, तुझसे भी गुनाह हो सकता है !

इस सवाल का जवाब तो मुझे बारहा मिल ही जाता है,
कि अब इससे भी बुरा और क्या हो सकता है !

सुना है कि ख़ुदा जो करता हैबेहतर करता है,
सब्र कर, इस नुक़सान में भी नफ़ा हो सकता है !

है क्या वजह जिसने मुझसे शायर बना डाला,
मत पूछ कि मेरा ज़ख़्म हरा हो सकता है !

ये डर तो था मुझे कि बिछड़ जायेंगे एक दिन
ये गुमान भी न था कि तू बेवफ़ा हो सकता है !

दिल लगाइये तो ज़रूर मगर लुटाइये नहीं,
जनाब, दिल के सौदे में ख़सारा हो सकता है !

अपने हालात पर जो तुझको सब्र आ जाए,
तो मुख़्तसर असासे में भी गुज़ारा हो सकता है !

ये और बात है कि वो तग़ाफ़ुल कर देगा,
कह लेने से मेरा दिल तो हल्का हो सकता है !

ठोकरों से सीखा है ‘फ़राज़’ ने संभलने का हुनर,
राह का हर एक पत्थर रहनुमा हो सकता है !

|||
फ़राज़ |||

तराशा= Chiseled
गुनाह= Fault, Crime, Sin
बारहा= Many Times
बेहतर= Better
सब्र= Patience
नुक़सान= Loss
नफ़ा= Profit
वजह= Reason, Cause
शायर= Poet
ज़ख़्म= Wound
गुमान= Doubt, Suspicion, Distrust,
बेवफ़ा= Unfaithful, Treacherous
ख़सारा= Loss
मुख़्तसर= Concise, Short, Abbreviated
असासे= Household Property, Belonging
गुज़ारा= Live Off, Livelihood
तग़ाफ़ुल= Neglect, Negligence.
हुनर= Talent, Art, Skill

रहनुमा= Guide