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सोमवार, 30 अप्रैल 2018

!!! दिल-ए-मुन्तज़िर !!!

मुझे बे-वजह सी लगती है ये बारिश की रातें,
हक़ीक़त न सहीख़याल  बनके चले आओ !

क्या कमी है दिल को, दिल समझ नहीं पाता,
जवाब न सही, तुम सवाल बनके चले आओ !

ये तन्हाईयाँ जिस्म में काँटों की तरह चुभती हैं,
मरहम न सहीशामिल-ए-हाल बनके चले आओ !

कब तलक जलता रहूँ मुसलसल मैं तपिश में,
उरूज न सही, मेरा ज़वाल बनके चले आओ !

दर्द की तासीर भी तो अब कम हो चली है,
सुकून न सही,तुम मलाल बनके चले आओ !

दिल-ए-मुन्तज़िर को 'फ़राज़' आराम तो आये,
वस्ल मुम्किन नहीं, तो इंतिक़ाल बनके चले आओ !

||| फ़राज़ |||

बे-वजह= Without Cause/Reason
हक़ीक़त= Reality
ख़याल= Thought, Imagination
तन्हाईयाँ= Loneliness
मरहम= Ointment
शामिल-ए-हाल= Associated With Present Circumstances.
मुसलसल= Continuous, 
तपिश= Heat, Scorch, Agitation.
उरूज= Rising, Exaltation, Ascension
ज़वाल= Decline
तासीर= Effect, Influence
सुकून= Peace, Tranquility
मलाल= Regret, Sorrow, Grief.
दिल-ए-मुन्तज़िर = The Expectant Heart
वस्ल = Union Or Meeting (Typically Used In The Context Of A Meeting Of Lovers)
मुम्किन = Possible
इंतिक़ाल= Death, Migration,