ये
और बात है कि सहते सितम रहे,
तेरे
ज़िक्र पे बारहा ख़ामोश हम रहे !
दुनिया
को ये शिकायत, क्यूँ फ़ासले हैं अब,
हमको
तो बस गिला है, क्यूँ पास हम रहे !
ख़ामोश
है मुंडेरें, सूनी है एक गली,
थे
रूबरू जहाँ पर, हर शाम हम रहे !
उसको
मेरी इबारत मशहूर कर गई
जिस
नाम के सफ़र में बदनाम हम रहे !
फ़राज़