रविवार, 30 अक्टूबर 2016

सफ़र

ये और बात है कि सहते सितम रहे,
तेरे ज़िक्र पे बारहा ख़ामोश हम रहे !

दुनिया को ये शिकायत, क्यूँ फ़ासले हैं अब,
हमको तो बस गिला है, क्यूँ पास हम रहे !

ख़ामोश है मुंडेरें, सूनी है एक गली,
थे रूबरू जहाँ पर, हर शाम हम रहे !

उसको मेरी इबारत मशहूर कर गई
जिस नाम के सफ़र में बदनाम हम रहे !


फ़राज़

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

ख़्वाब

नींद से था जागा मगर आँख लगी हो जैसे,
रात फिर ख़्वाब में मुझको तू मिली हो जैसे !

ख़्वाब जो टूट गया उसकी तासीर ही कुछ ऐसी थी,
तेरे आग़ोश में कोई रात कटी हो जैसे !

ख़्वाब के बोझ से पलकें मेरी यूँ बोझिल हैं,
नींद फ़िर तेरा पता पूछ रही हो जैसे !

मैंने दामन तेरा कुछ सोच के फ़िर थाम लिया
कोई रंजिश कभी तुझसे न रही हो जैसे !

मेरे हाथों में कुछ देर तलक तेरा हाथ रहा,
ख़्वाब में ख़्वाब को ताबीर मिली हो जैसे !

मैंने माना ये हक़ीकत नहीं, महज़ ख्वाब ही था,
एक लम्हे को तेरी आहट साथ रही हो जैसे !

बारहा ख़्वाब था, तो टूट ही गया,
मुझसे तू ख़्वाब में भी रूठ गयी हो जैसे !

रविवार, 16 अक्टूबर 2016

जाने वाले नहीं फ़िर लौट कर आने वाले !!!

है पूछता बारिश का पानी मुझसे
कहाँ गए वो काग़ज़ की नाव चलने वाले,

अपनों की शिक़ायत ग़ैरों से क्या करूँ
ख़ुद रूठ गए मुझको मनाने वाले,

एक हवा का झौंका तूफ़ान हो गया
     ख़्वाब हो गए सब साथ निभाने वाले,

इल्ज़ाम हमने सारे तस्लीम कर लिए
मायूस हो गए इल्ज़ाम लगाने वाले,

एक बादल का टुकड़ा देखा तो याद आया,
जाने वाले फ़िर नहीं  लौट कर आने वाले !!!

||| फ़राज़ |||

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

वक़्त की रेत सा तू हाथों से बह गया...

क़तरा वो स्याही सा क़ाग़ज़ पर रह गया,
अश्क़ों की स्याही से अशआर कह गया...
फिर से जो खंगाली दास्तान अपनी,
एक लम्हा आँखों के साहिल से बह गया...

एक झूठी हक़ीकत, एक बिसरी कहानी,
एक आरज़ू ख़्वाब में वो फिर से दे गया...
ये क्या दीवानगी, कि अब भी मुस्कुराता है,
तन्हाइयों के ज़ख्म जो तन्हा ही सह गया...

ये मेरी फुरक़त कि तू नहीं हासिल,
वक़्त की रेत सा तू हाथों से बह गया...
मुझको भी हुनर अता हो अदाकारी का,
कैसे लिखूं की दूर तू किस तरह गया...

वक़्त की धूल है आइनों पर जम गई,
परछाईंया है मेरी, पर चेहरा रह गया...
जो था मेरी हक़ीकत, ख़ुद ख़्वाब हो गया,
जाने वाले तू ये क्या ताबीर कह गया...

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

निशानियाँ



ये न सोचा था की फ़ासला इतना होगा,
तेरी तस्वीर होगी पर तेरा चेहरा न होगा !

दूरियों की धुंध छाती थी, छंट जाती थी,
अबकी जो धुंध छंटी तो भी सवेरा न होगा !

मैं न सही पर कुछ निशानियाँ तो बाक़ी होंगी,
एक सूखा गुलाब किताबों में अब भी रखा होगा !

यूँ तो बहुत कुछ है जो अभी अनकहा ही रह गया,
अनकहा ही रहेगा जो फ़िर न कभी सामना होगा,

तुमसे ही शुरू हुए और तुम पर ही ख़त्म,
इससे बेहतर न मेरी कहानी का तर्जुमा होगा !!!

|||फ़राज़|||

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

कसम


यही बेहतर है की अब तुमको भूल जाऊं मैं,
दिल बेवजह अपना और न दुखाऊँ मैं

मेरे हालात की ख़बर भी न हो तुमको
राज़ कोई दफ़न सीने में हो जाऊं मैं

तेरे ख्यालों के चराग़ हैं दिल में रोशन
बुझा कर वो ख़यालात ख़ुद ही बुझ जाऊं मैं

याद तो सब है, बस याद नहीं करना है
बात हर लम्हा यही ख़ुद को समझाऊँ मैं

कभी तो ताबीर-ए-ख़्वाब मुझपर भी हो
पर क्या करूँ जो रातों को न सो पाऊँ मैं

तुम याद करो वादे जो पूरे न किये
मुझे है रंज की अब भी क्यूँ निभाऊँ मैं

ली थी कसम कि तुमको न भूलेंगे कभी
ली थी कसम, तो तुमको कैसे भुलाऊँ मैं

शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

क़सक

वो मेरे सामने था मगर किसी चाँद की तरह,
उसे देख तो सकता था मैं, छू सकता न था !

रस्मी ही सही, उसने हाल तो पूछा था,
उसे परवाह नहीं, मैं कह सकता न था !

दिल आज़ारी न कहो, कि सीनारेज़ी थी,
ज़ख्म जो उसने दिए, मैं दिखा सकता न था !

ये वक़्त के ज़ख्म भरने में वक़्त लगेगा,
इतना भी वो मुझको समझा सकता न था...


वो फ़िर मिला मुझे एक अजीब मोड़ पर,
कि जा रहा था वोमैं रोक सकता न था !

सिर्फ़ वो ही नहीं बदला, मेरे भी कुछ वादे थे
'फ़राज़आईने को झुठला सकता न था...