रविवार, 30 जून 2019

बातें


ये मंदिरये मस्जिदशिवालों की बातें
नहीं होने देतीं निवालों की बातें !

चलो आओ रस्ता अमन का निकालें,
बहुत हो चुकी हैं वबालों की बातें !

कितनी मुश्किल में हैं ये शहर के बशर,
कितनी आसान हैं गाँव वालों की बातें !

जो कमतर हैं उनको बुरा ही लगेगा,
चराग़ों से न कर मशालों की बातें !

इस शग़ल में मेरा आज कल बन गया,
सोचता मैं रहा गुज़रे सालों की बातें !

ग़ज़ल कोई लिक्खा करो तुम सुकूँ की,
बहुत लिख चुके तुम मलालों की बातें !

मोहब्बत के क़िस्सेवफ़ा की कहानी,
हैं सारी की सारी ख़यालों की बातें !

आज मेरी ग़ज़ल फिर घटा बना गई,
आज मैंने लिखीं उनके बालों की बातें !

अपनी सुर्ख़ी पे उसको भरम न रहा,
शाम ने जब सुनी उनके गालों की बातें !

देख कर आईना ख़ुद पे करना गुमाँ,
ये तो 'अल्फ़ाज़हैं हुस्नवालों की बाते !

||| अल्फ़ाज़ |||

शिवाला = A Temple/Shrine Dedicated To Lord Shiva
निवाला = Morsel, Mouthful, कौर
अमन = Peace, शांति
वबाल = Calamity, Ruin, कष्टझंझट
बशर = Man, Human Being, मनुष्य
कमतर = Lesser, Inferior, अवर, निम्न
चराग़ = An Oil Lamp, दीपकदिया
मशाल = Torches, Flames
शग़ल = Hobby, कामव्यस्तता
सुकूँ = Peace, Quietness, शांति
मलाल = Regret, Grief, Sorrow, दुःखकष्ट वैमनस्य
क़िस्सा = Tale, Story
वफ़ा = Fulfillment, Fidelity, प्रतिज्ञा पालननिबाह,
ख़याल = Thought, Imagination, कल्पनाविचार,
घटा = Clouds, Cloudiness
सुर्ख़ी = Redness, लालिमा
भरम = Reputation, Esteem, Trust, Secret
गुमाँ = Doubt, Suspicion, गुमानघमंड


बुधवार, 26 जून 2019

क़रार


जो कहा नहींजो सुना नहीं,
जो किसी ग़ज़ल में बयाँ नहीं !

वो जो हममें तुममें क़रार था,
हालात के आगे टिका नहीं !

पिंजरा तो उसने खोल दिया,
उड़ सकता था मैं उड़ा नहीं !

शायद उसको जाना ही था,
आवाज़ दी पर वो रुका नहीं !

शीशा गल के जुड़ सकता है,
दिल टूटा तो फ़िर जुड़ा नहीं !

ता'वीज़ दो उसको इश्क़ हुआ,
आसेब की कोई दवा नहीं !

तूफ़ान से तो बच सकता था,
मैं दरख़्त था झुक सका नहीं !

फ़िर लौट मेरी चिट्ठी आई,
वो घर अब उसका पता नहीं !

'अल्फ़ाज़कई हमराह मिले,
पर इश्क़ दोबारा मिला नहीं !

||| अल्फ़ाज़ |||

बयाँ = Statement, Assertion, वर्णनकहना
क़रार = Agreement, Bond, अनुबंधसमझौता
ता'वीज़ = Amulet, Talisman, जंतर
आसेब = Evil Spirit, Demon, भूत-प्रेतप्रेत-बाधा
दरख़्त = Tree, पेड़वृक्ष
हमराह = Fellow-Traveler, सहयात्री

शनिवार, 22 जून 2019

ग़ज़ल

एक मुश्किल मेरी जैसे हल हो गई,
याद तुझको किया और ग़ज़ल हो गई !

क़ाफ़िया चाहिए हमको हर लफ्ज़ का,
शायरी यूँ हमारा शग़ल हो गई !

फ़र्क़ पड़ता है क्या कैसा दिखता है तू,
अब मोहब्बत मेरी बे-शक्ल हो गई !

तूने तोड़ी क़समफ़िर भी जिंदा हैं हम,
आस बस इक ज़रा सी क़तल हो गई !

तेरे दिल में ठिकाना न मेरा रहा,
मेरे दिल से भी तू बे-दख़ल हो गई !

सब ख़ताएँ तो 'अल्फ़ाज़' की ही नहीं,
जैसी सोहबत थी वैसी अक़ल हो गई !

||| अल्फ़ाज़ |||

क़ाफ़िया = Rhyme, The Last Or Second Last Words Of Each Verse Is Called Qafiya, तुकांत
लफ्ज़ = Word, शब्द
शग़ल (शग़्ल) = Hobby, काम, व्यस्तता
फ़र्क़ = Difference, अन्तर
बे-शक्ल = Faceless, 
आस = Hope, आशा, उम्मीद
क़तल (क़त्ल) = Murder, हत्या
बे-दख़ल = Disinherit, Dislodge, Evict, निष्कासित अधिकारच्युत
ख़ता = Mistake, Fault, दोष
सोहबत = Association, Company, संगत
अक़लअक़्ल = Wisdom, Knowledge, बुद्धिविवेक

सोमवार, 17 जून 2019

चाय का प्याला

नशा हो कर के भी हलाल होता है,
चाय का प्याला भी कमाल होता है !

||| अल्फ़ाज़ |||

हलाल (Halaal) = Permissible, Lawful
कमाल (Kamaal) = Excellent

फ़ासले

इस तरह थे कभी फ़ासले ही नहीं,
यूँ मिले जैसे पहले मिले ही नहीं !

उनसे पहले कोई दर्द हमको न था,
उनसे पहले कोई ग़म मिले ही नहीं !

आ भी जाओ तो वो बात होगी नहीं,
तुममें हममें वो अब सिलसिले ही नहीं !

सारे इल्ज़ाम तस्लीम हमने किये,
दरमियाँ अब कोई मसअले ही नहीं !

आख़िरी बार हमसे वो ऐसे मिले,
जैसे पहले कभी भी मिले ही नहीं !

उनको ख़ुश देख कर हम ज़रा जल गए,
हमको लगता था हम दिल-जले ही नहीं !

उम्र भर की कचहरी का चक्कर है इश्क़,
रोज़ तारीख़ हैफ़ैसले ही नहीं !

उनसे अल्फ़ाज़’ जब इश्क़ ही न रहा,
उनसे शिकवे नहींऔर गिले ही नहीं !

||| अल्फ़ाज़ |||

फ़ासले = Distance, दूरी
इल्ज़ाम = Allegation, Blame, आरोप
तस्लीम = Accept, Acknowledge, स्वीकार
दरमियाँ = Middle, In Between, मध्य
मसअले = Problem , Matter, 
दिल-जले = Bereaved, Frustrated
कचहरी = Court, न्यायालय
तारीख़ = Date, 
फ़ैसले = Decision, Judgment, निर्णय
शिकवे = Complaint, Reproach 
गिले = Complaint, Lamentation

रविवार, 16 जून 2019

वालिद

वालिद के जैसा बन जाऊँगा,
उस दिन मैं फ़रिश्ता बन जाऊँगा !

||| अल्फ़ाज़ |||

वालिद = Father, पिता
फ़रिश्ता = An Angel, देवदूत

गुरुवार, 13 जून 2019

मैं एक शहर पुराना सा

तुम एक नई सड़क जैसी,
और मैं एक शहर पुराना सा !

मैं तुमको रोज़ ही तकता हूँ ,
तुम मुझसे रोज़ गुज़रती हो,
धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा,
तुम मुझको रोज़ बदलती हो !

मैं रोज़ ही ख़ुद से कहता हूँ,
कि मुझको नहीं बदलना है,
मैं जैसा भी हूँ, ठीक हूँ मैं,
मुझको ऐसा ही रहना है !

पर तेरे आने जाने से,
कुछ मुझमें रोज़ बदलता है,
तेरी ज़िद पे, मेरी ज़िद का,
कुछ ज़ोर कहाँ अब चलता है !

तेरी इस आवाजाही से,
मैं रोज़ नया हो जाता हूँ,
मैं जितना तुमको पाता हूँ ,
मैं उतना ख़ुद खो जाता हूँ !

लगता है कुछ वक़्त में मैं,
तेरे जैसा हो जाऊँगा,
हो जाओ पुरानी तुम थोड़ी,
थोड़ा मैं नया हो जाऊँगा !

तुम एक नई सड़क जैसी,
और मैं एक शहर पुराना सा !

||| अल्फाज़ |||