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गुरुवार, 13 जून 2019

मैं एक शहर पुराना सा

तुम एक नई सड़क जैसी,
और मैं एक शहर पुराना सा !

मैं तुमको रोज़ ही तकता हूँ ,
तुम मुझसे रोज़ गुज़रती हो,
धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा,
तुम मुझको रोज़ बदलती हो !

मैं रोज़ ही ख़ुद से कहता हूँ,
कि मुझको नहीं बदलना है,
मैं जैसा भी हूँ, ठीक हूँ मैं,
मुझको ऐसा ही रहना है !

पर तेरे आने जाने से,
कुछ मुझमें रोज़ बदलता है,
तेरी ज़िद पे, मेरी ज़िद का,
कुछ ज़ोर कहाँ अब चलता है !

तेरी इस आवाजाही से,
मैं रोज़ नया हो जाता हूँ,
मैं जितना तुमको पाता हूँ ,
मैं उतना ख़ुद खो जाता हूँ !

लगता है कुछ वक़्त में मैं,
तेरे जैसा हो जाऊँगा,
हो जाओ पुरानी तुम थोड़ी,
थोड़ा मैं नया हो जाऊँगा !

तुम एक नई सड़क जैसी,
और मैं एक शहर पुराना सा !

||| अल्फाज़ |||