शुक्रवार, 30 जून 2017

ख़ानाबदोशियां!!!

मुद्दतों तलक बेवजह दश्त-ओ-बियाबान भटके,
तेरे फ़ितूर से बचने को हम सारा जहान भटके !

यूँ तो हैं दिल को मेरे रंजिशें तुझसे हज़ार,
लेकिन पर्देदारियों की ख़ातिर बेज़ुबान भटके !

तेरे अक्स तलाशने चले थे तेरी मुंडेरों के साए में,
धूप छाँव के एक खेल में हम सुबह शाम भटके !

सोचा था मयक़शी से भर जायेंगे कुछ तो ज़ख्म,
लेकिन तेरी जलन में तिश्ना साक़ी-ओ-जाम भटके !

इतने भी नहीं तन्हा अभी ख़ानाबदोशियों से “फ़राज़”,
मेरी गर्दिशों में साथ मेरे भी कुछ महेरबान भटके !!!

|||फ़राज़|||

मुद्दत=for a long time
रंजिश=ill-will, hostility
तिश्ना=thirsty, insatiable, eagerly
साक़ी-ओ-जाम= bartender or cup-bearer and goblet.
दश्त-ओ-बियाबान= forest and deserts 
ख़ानाबदोशियाँ=nomadicity
गर्दिश= misfortune

बुधवार, 28 जून 2017

हिज्र के मौसम !!!

अपनी ही अना की किरचियों से
हम लेकर पोशीदा ज़ख्म लौटे,
आज तेरी चौखट से पशेमान
फ़िर हम मायूस क़दम लौटे!

मेरे किसी अपने के पते पर
अब कोई अग़यार रहता है,
तजुर्बों से संगसार होकर
न जाने कितने वहम लौटे!

तू दरवाज़े तक आकर भी
कुछ सोच कर लौट गया,
हसरतज़दा निगाहों में 
बारहा आख़िर सावन लौटे!

दहलीज़ पर तेरी न ढूँढ सके
क़दमों का तेरा हम कोई निशान,
उम्मीद की बिसरी गलियों में 
आज फ़िर हिज्र के मौसम लौटे!

|||फ़राज़||||

अना= self, ego

पोशीदा= hidden
पशेमान= embarrassed, penitent
अग़यार= strangers, opponents
संगसार= stoned, stoned to death
हसरतज़दा= overwhelmed, grief-stricken
बिसरी= forgotten
हिज्र= separation

शनिवार, 17 जून 2017

अभी ताज़ा है ज़ख्म, थोड़ा अभी सह लेने दो..

अभी ताज़ा है ज़ख्म,
थोड़ा अभी सह लेने दो..
आज मुझे ज़रा देर चुप रह लेने दो..

अभी मैं बिखरा हूँ,  
कुछ वक़्त में सिमट जाऊँगा..
अभी सोया हूँ,
जब जागूँगा तो निखर जाऊँगा..
मेरे हालात से तुम न परेशान होना..
मैं हूँ दरिया,
समंदर नहीं, जो ठहर जाऊँगा..
अभी ताज़ा है ज़ख्म,
थोड़ा अभी सह लेने दो..
आज मुझे ज़रा देर चुप रह लेने दो..

अभी बाक़ी हैं हवास,
कोई बात न मैं समझूंगा..
एक पैमाना और कर दूँ ख़ाली,
तो कुछ समझूंगा..
अभी ज़िन्दगी के कुछ घूँट
भी हैं पीना बाक़ी..
जो कुछ बूँदें ही मिल जाएँ,
तो ग़नीमत समझूंगा..

मुझसे ख़्वाबों में भी तुम
न कोई रिश्ता रखना..
इतना है कहना,
इतना ही बस कह लेने दो..
अभी ताज़ा है ज़ख्म,
थोड़ा अभी सह लेने दो..
आज मुझे ज़रा देर चुप रह लेने दो...

आज भी याद है मुझको
जब तुमने कुछ कहा भी न था..
तुम ही आँखों में,
ख़्वाबों में, मेरी ज़िन्दगी में थे..
आज भी याद हैं ठिकाने
तुमसे मिलने के..
आज भी कानों में
पहली सी सदा आती है..
ये, और कुछ और बातें,
जो अधूरी रह गयीं..
आज फिर ये बातें,
मुझे खुद से कह लेने दो..
अभी ताज़ा है ज़ख्म,
थोड़ा अभी सह लेने दो..
आज मुझे ज़रा देर चुप रह लेने दो...


फ़राज़

बुधवार, 7 जून 2017

इश्क़-ए-तिजारत !!!


हम फूल से ज़ख़्मी हो बैठे,
काँटों की शिक़ायत क्या करते !
हाकिम ही मेरा जब मुजरिम है,
हम अपनी वक़ालत क्या करते !

लुटना ही दिलों की क़िस्मत है,
हम दिल की हिफ़ाज़त क्या करते !
इल्ज़ाम तेरे सब हम पर हैं,
हम और सख़ावत क्या करते !

तू दर्द-ओ-सितम का सौदागर,
हम इश्क़-ए-तिजारत क्या करते !
तू ख़ुद की इबादत करता है,
हम तुझसे मोहब्बत क्या करते !

|||फ़राज़|||

हाकिम= Judge, Ruler, Master
मुजरिम= Sinner, Culprit, Offender
वक़ालत= Advocacy
सख़ावत= Generosity
इश्क़-ए-तिजारत= Trade/ Commerce of love