रात है, चाँद है, और फ़िर तन्हाई,
रात चराग़ों में फ़िर जली हो जैसे !
ये तेरी आहट, कि बढ़ गयी धड़कन,
ये तेरा साया, कि तू मिली हो जैसे !
दिल में तक़लीफ़ सी जगी हो जैसे,
याद फ़िर सीने में चुभी हो जैसे,
ये ख़याल फ़िर तेरे न होने का,
चोट कोई फ़िर छिल गई हो जैसे !
इतनी क़ुर्बत कि हर पल की ख़बर रहती थी,
इतनी दूरी कि कोई दुश्मनी हो गई हो जैसे,
बात करती है तो बस ज़ख्म देती है,
देखती यूँ है कि कोई अजनबी हो जैसे !
है क्या दीवानगी, ये तमन्ना धुंधली सी,
उसके आने की कोई आस बची हो जैसे !
वक़्त-ए-रुख़सत तूने मुड़कर न देखा पीछे...
ज़िन्दगी साथ मेरा छोड़ चली हो जैसे...
|||फराज़|||
|||फराज़|||