शनिवार, 26 मार्च 2022

हक़ीक़त

 भड़कती आग फिर कैसे जो चिंगारी नहीं रहती,

बिगड़ जाए तो कोई बात भी छोटी नहीं रहती!

 

बहुत नाज़ुक सा शीशा है इसे न ठेस पहुँचाओ,

दरार आ जाए तो फिर दोस्ती उतनी नहीं रहती!

 

किसी ने क़ुदरतन मेरी जगह को भर दिया होगा,

जगह कोई भी ज़्यादा देर तक ख़ाली नहीं रहती!

 

कि तुम तो लिखते हो पानी पे मेरा नाम ऊँगली से,

हथेली पे भी ज़्यादा देर तक मेंहदी नहीं रहती!

 

बड़ी मासूमियत से पूछता है दिल निगाहों से,

हक़ीक़त क्यूँ कभी भी ख़्वाब के जैसी नहीं रहती!

 

बड़ा ही काम का मसला बताया खोने वालों ने,

बड़ी अच्छी है लगती चीज़ जब अपनी नहीं रहती!

 

महज़ सूरत किसीकी देख कर रिश्ता नहीं करना,

किसी गुल पे कभी भी उम्रभर शोख़ी नहीं रहती!

 

नहीं ढलती वहाँ रातें, वहाँ सुब्हा नहीं होती,

जहाँ उम्मीद की कोई शमा जलती नहीं रहती!

 

बिला-शुब्हा मेरे जीने का कोई ख़ास मक़सद है,

बिला-वज्हा किसीकी साँस यूँ चलती नहीं रहती!

 

कभी अपना हुनर ले करके तुम बाज़ार मत जाना,

बिकाऊ हो तो कोई चीज़ भी महँगी नहीं रहती!

 

बहुत संभाल के करना मदद अल्फ़ाज़लोगों की,

भलाई बे-वजह की आजकल अच्छी नहीं रहती!

|||अल्फ़ाज़ |||

 

नाज़ुक = कोमल, मृदु

क़ुदरतन= स्वाभाविक रूप से

मसला (मस’अला)= विषय, समस्या,

महज़= केवल, मात्र

बिला शुब्हा= निश्चित रूप से

मक़सद= लक्ष्य, कारण

बिला वज्हा= अकारण

मंगलवार, 8 मार्च 2022

ग़ज़ल

 अल्लाह से रहे न भगवान से रहे,

इंसान को उम्मीद जो इन्सान से रहे!

 

पिछले दिनों शहर में होने थे इन्तिख़ाब,

पिछले दिनों शहर में सब ध्यान से रहे!

 

तुमको पता नहीं हैं जीने की मुश्किलें,

तुमको सवाल सारे आसान से रहे!

 

माँगी मदद जो उनसे तो मशवरा मिला,

अपनों के हमपे कितने एहसान से रहे!

 

बैठे नहीं हमारे ज़्यादा क़रीब वो,

अबकी हम उनके घर में मेहमान से रहे!

 

ऐ काश, या शायद नहीं, लेकिन, अगर-मगर,

मेरे ज़हन में कितने इम्कान से रहे!

 

हमको पता है हमको कुछ भी नहीं पता,

दानिशवरों की तरहा नादान से रहे!

 

उनको भी फ़ाइदा था इस झूठ से तभी,

सच जान कर भी सच से अंजान से रहे!

 

हैरान होके क्या-क्या हम आज लिख गए,

कुछ देर ख़ुद को पढ़ के हैरान से रहे!

 

घुटता रहा हमेशा अल्फ़ाज़ का ज़मीर,

फ़ित्ने लिपट-लिपट के ईमान से रहे!

||| अल्फ़ाज़ |||

 

इन्तिख़ाब  चुनाव, election

मशवरा सलाह, परामर्श, advice

इम्कान अंदेशा, शंका, doubts

दानिशवर बुद्धिमान, wise

नादान अज्ञानी

ज़मीर अन्त:करण, विवेक, conscience

फ़ित्ना बुराई, पाप, evil, sin

रविवार, 20 फ़रवरी 2022

फ़रायज़

 फ़रायज़ याद आए हैं, रिवायत याद आई है,

अभी तारीख़ देखी तो मोहब्बत याद आई है!

 

ज़रा सी बात पर आँसू नहीं अब खर्च करते हैं,

लुटा करके ख़जाने को क़िफ़ायत याद आई है!

 

जो आईने को देखूँ तो उमर पे ध्यान जाता है,

मेरी भूली शकल मुझको निहायत याद आई है!

 

अधूरे, थे, अधूरे हैं, बहुत से शौक़ मेरे हैं,

मगर दीवार देखी तो मरम्मत याद आई है!

 

बुरा लगता था मुझको गर कोई रोके, कोई टोके,

नहीं कहता कोई कुछ तो नसीहत याद आई है!

 

सुना है अब से बस्ती में बुरा कुछ भी नहीं होगा,

सुना है कुछ शरीफ़ों को शराफ़त याद आई है!

 

किया था क़त्ल तो हमको अदालत पे यक़ीं न था,

हुए हैं क़त्ल तो हमको अदालत याद आई है!

 

दलीलें, दाँव, तरकीबें कहाँ तक काम आती हैं,

न कुछ भी काम आया तो इबादत याद आई है!

 

करें तो क्या करें ‘अल्फ़ाज़’ हम हैं फ़ितरतन क़ैदी,

हुए आज़ाद तो फिर से हिरासत याद आई है!

||| अल्फ़ाज़ |||

 

फ़रायज़ = Duties, कर्तव्य

रिवायत =Tradition, Custom, परम्परा

तारीख़ = Date, तिथि

क़िफ़ायत = Economy, मितव्ययता

उमर (उम्र) = Age, आयु

शकल (शक्ल) = Face, मुख, चेहरा

निहायत (Nihayat) = Very Much, Extreme, अत्यंत

मरम्मत (Marammat) = Maintanance

गर (Gar) = If. यदि

नसीहत (Nasiihat) =  Advice, Counsel, सदुपदेश, अच्छी सलाह

शरीफ़ (Shareef) = Gentle, सज्जन

शराफ़त (Sharaafat) = Gentleness, सज्जनता

क़त्ल (Qatl) = Murder, हत्या

यक़ीं (Yaqiin) = Confidence, Trust, विश्वास

दलील (Daleel) = Argument, तर्क

दाँव (Daanv) = Gamble

तरकीब (Tarkeeb) = Method, Trick, युक्ति

इबादत (Ibadat) = Prayer, Adoration, आराधना, भक्ति

फ़ितरतन (Fitratan) = By Nature, स्वाभाविक रूप से

क़ैदी (Qaidi) = Prisoner

हिरासत (Hirasat) = Custody, अभिरक्षा

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

दरकार

करिश्मा कोई दिखलाओकोई तो मो'जिज़ा दे दो,
किताबों में जो लिक्खा हैमुझे वैसा ख़ुदा दे दो !

ख़ुदाओं का ये मजमा हैमैं तुझको कैसे पहचानूँ,
वो जो तुम तक पहुँचता होमुझे वो रास्ता दे दो !

मुझे ऊँची मिनारों की कहानी तुम न बतलाओ,
मुझे खुल कर के उड़ना हैमुझे तुम आसमाँ दे दो !

मैं हूँ इन्सान मैं करता रहूँगा ग़ल्तियाँ बेशक,
फ़रिश्ते तुम अगर हो तो मुझे बेशक सज़ा दे दो !

मुझे मालूम है तुम आजकल मसरूफ़ रहते हो,
मदद तो कर न पाओगेकम-अज़-कम मशवरा दे दो !

उसे गर लौटना होगावो ख़ुद ही लौट आएगा,
वो जाना चाहता है तो उसे तुम रास्ता दे दो,

मुझे मुद्दत से गहरी नींद की दरकार होती है,
फ़ना कर दोक़तल कर दोज़हर दे दोदवा दे दो !

नहीं तोहफ़ा कोई मेरे लिए 'अल्फ़ाज़से बेहतर,
अधूरी शायरी हूँ मैंमुझे तुम क़ाफ़िया दे दो !

||| अल्फ़ाज़ |||

करिश्मा = Miracle, Wonder, चमत्कार
मो'जिज़ा = Miracle, Wonder, चमत्कार
मजमा = Gathering, Crowd, भीड़
मिनार = Minaret, Tower,
बेशक = Doubtless, निसंदेह
फ़रिश्ता = An Angel, Messenger Of God, देवदूत
मसरूफ़ = Busy, व्यस्त
कम-अज़-कम = At Least, कम से कम
मशवरा = Advice, Counsel. राय, सलाह
मुद्दत = Length Of Time, Duration, बहुत समय
दरकार = Necessary, Required, Demand, आवश्यकता 
फ़ना = Destruction, नष्टतबाह
क़तल (क़त्ल) = Murder, हत्या




मंगलवार, 6 अगस्त 2019

मेरी ग़ज़ल

जब तेरे ख़यालात पे मचली मेरी ग़ज़ल,
तब दश्त-ओ-बयाबान में भटकी मेरी ग़ज़ल !

सीने में फिर से कोई अरमान जला है,
काग़ज़ पे आतिशाना सुलगी मेरी ग़ज़ल !

दिल ने तेरी उम्मीद की शम्मा जलाई है,
जल कर के मोम जैसी पिघली मेरी ग़ज़ल !

जैसे कि चाँद पर से सरके कोई बादल,
रुख़ से नक़ाब जैसी सरकी मेरी ग़ज़ल !

सदियों का सफ़र कर के बस एक ही लम्हें में ,
मुट्ठी से रेत जैसी फिसली मेरी ग़ज़ल !

मैं आ गया समझ में शायद जनाब की,
वो फिर से पढ़ रहे हैं पिछली मेरी ग़ज़ल !

जिस मोड़ पे हमारी राहें जुदा हुईं थीं,
उस मोड़ पे हमेशा ठहरी मेरी ग़ज़ल !

अल्फ़ाज़ लिख रहा हैपढ़िये ज़रा संभल के,
कभी ज़हर तो कभी आग भी उगली मेरी ग़ज़ल !

||| अल्फ़ाज़ |||

ख़यालात = Thoughts, Imaginations, कल्पना
दश्त-ओ-बयाबान =  Desert And Wilderness
अरमान = Desire, Longing, Yearning, इच्छालालसा
आतिशाना = Fire-Like
शम्मा= Candle
रुख़ = Face, Appearance,on, Features
नक़ाब = Fem, Veil


रविवार, 4 अगस्त 2019

दोस्त

अश्क़ों को मुस्कुरा के पीना सिखा दिया,
हँसने का मुझको फ़िर से क़रीना सिखा दिया,
कैसे अदा करूँगा मैं तेरा शुक्रिया,
ऐ दोस्त, तूने मुझको जीना सिखा दिया !

||| अल्फ़ाज़ |||

अश्क़ = Tear. आँसू
क़रीना= Manner, Method, ढंग, तरीका
शुक्रिया = thanks, धन्यवाद

शनिवार, 3 अगस्त 2019

क्यूँ है

एक ख़ौफ़ का ये मंज़र क्यूँ है,
अपने ही घर में डर क्यूँ है !

झगड़ा तो है इंसानों का,
रुसवा मस्जिद-मंदिर क्यूँ है !

जिन हाथों में मुस्तक़बिल था,
उन हाथों में पत्थर क्यूँ है !

जो बात ज़रूरी है कहनी,
वो ही दिल के अंदर क्यूँ है !

तुमको भी इश्क़ हुआ था न,
इल्ज़ाम सिरफ़ मुझ पर क्यूँ है !

कहते हैं इसको बड़ा शहर,
तो इतने छोटे घर क्यूँ हैं !

कुछ करना है तो कर डालो,
इतनी भी अगर मगर क्यूँ है !

अल्फ़ाज़’ के दुश्मन ज़ाहिर थे,
तो पीठ में ये ख़ंजर क्यूँ है !

||| अल्फ़ाज़ |||

ख़ौफ़ = Fear, Dread, Terror, भय
मंज़र = Scene, View, दृश्य
रुसवा = Dishonored, Despondent, अपमानितहताश
मुस्तक़बिल = Future, भविष्य
इल्ज़ाम = Allegation, Blame, आरोप
सिरफ़ = Only, मात्र
ज़ाहिर = Evident, Open, प्रत्यक्ष

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

हम-नज़र

हर पहर चाहिएता-उमर चाहिए,
मुझको तेरी वफ़ाउम्र-भर चाहिए !

देखे जब आईनाउसको मैं ही दिखूँ,
मुझको मुझसा कोई हम-नज़र चाहिए !

मेरी ज़िद है उसे सिर्फ़ मैं ही तकूँ,
मुझको घूँघट में मेरा क़मर चाहिए !

साथ मेरे चले मेरी परछाईं सा,
मुझको मेरी तरह हम-सफ़र चाहिए !

साथ तेरे ही शामें ढलें उम्र-भर,
साथ तेरे शबों की सहर चाहिए !

ज़ुल्म करना है तो मुझपे जी भर के कर,
तुझसे कुछ भी कहाँ मुख़्तसर चाहिए !

एक मुद्दत से प्यासा मैं 'अल्फ़ाज़हूँ,
अबकी सावन कोई तर-ब-तर चाहिए !

||| अल्फ़ाज़ |||

पहर = Period Of Time, An 8th Hour Of A Day
ता-उमर = Life Long, आजीवन
वफ़ा = Love/Fulfillment, Fidelity, प्रेमईमानदारीनिष्ठा
हम-नज़र = People Who've Same Vision/Point Of View, समद्रष्टा
क़मर = The Moon, चंद्रमाचाँद
हमसफ़र = Fellow-Traveler, सहयात्री
शब = Night, रात
सहर = Morning, प्रभातसुबह
ज़ुल्म = Oppression, Injustice, उत्पीड़नअत्याचार
मुख़्तसर = Brief, संक्षिप्त
मुद्दत = A Length Of Time, Duration, बहुत समय

तर-ब-तर = Completely Drenched