मंगलवार, 8 मार्च 2022

ग़ज़ल

 अल्लाह से रहे न भगवान से रहे,

इंसान को उम्मीद जो इन्सान से रहे!

 

पिछले दिनों शहर में होने थे इन्तिख़ाब,

पिछले दिनों शहर में सब ध्यान से रहे!

 

तुमको पता नहीं हैं जीने की मुश्किलें,

तुमको सवाल सारे आसान से रहे!

 

माँगी मदद जो उनसे तो मशवरा मिला,

अपनों के हमपे कितने एहसान से रहे!

 

बैठे नहीं हमारे ज़्यादा क़रीब वो,

अबकी हम उनके घर में मेहमान से रहे!

 

ऐ काश, या शायद नहीं, लेकिन, अगर-मगर,

मेरे ज़हन में कितने इम्कान से रहे!

 

हमको पता है हमको कुछ भी नहीं पता,

दानिशवरों की तरहा नादान से रहे!

 

उनको भी फ़ाइदा था इस झूठ से तभी,

सच जान कर भी सच से अंजान से रहे!

 

हैरान होके क्या-क्या हम आज लिख गए,

कुछ देर ख़ुद को पढ़ के हैरान से रहे!

 

घुटता रहा हमेशा अल्फ़ाज़ का ज़मीर,

फ़ित्ने लिपट-लिपट के ईमान से रहे!

||| अल्फ़ाज़ |||

 

इन्तिख़ाब  चुनाव, election

मशवरा सलाह, परामर्श, advice

इम्कान अंदेशा, शंका, doubts

दानिशवर बुद्धिमान, wise

नादान अज्ञानी

ज़मीर अन्त:करण, विवेक, conscience

फ़ित्ना बुराई, पाप, evil, sin

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें