भड़कती आग फिर कैसे जो चिंगारी नहीं रहती,
बिगड़
जाए तो कोई बात भी छोटी नहीं रहती!
बहुत
नाज़ुक सा शीशा है इसे न ठेस पहुँचाओ,
दरार
आ जाए तो फिर दोस्ती उतनी नहीं रहती!
किसी
ने क़ुदरतन मेरी जगह को भर दिया होगा,
जगह
कोई भी ज़्यादा देर तक ख़ाली नहीं रहती!
कि
तुम तो लिखते हो पानी पे मेरा नाम ऊँगली से,
हथेली
पे भी ज़्यादा देर तक मेंहदी नहीं रहती!
बड़ी
मासूमियत से पूछता है दिल निगाहों से,
हक़ीक़त
क्यूँ कभी भी ख़्वाब के जैसी नहीं रहती!
बड़ा
ही काम का मसला बताया खोने वालों ने,
बड़ी
अच्छी है लगती चीज़ जब अपनी नहीं रहती!
महज़ सूरत
किसीकी देख कर रिश्ता नहीं करना,
किसी
गुल पे कभी भी उम्रभर शोख़ी नहीं रहती!
नहीं
ढलती वहाँ रातें,
वहाँ सुब्हा नहीं होती,
जहाँ
उम्मीद की कोई शमा जलती नहीं रहती!
बिला-शुब्हा मेरे जीने
का कोई ख़ास मक़सद है,
बिला-वज्हा किसीकी
साँस यूँ चलती नहीं रहती!
कभी
अपना हुनर ले करके तुम बाज़ार मत जाना,
बिकाऊ
हो तो कोई चीज़ भी महँगी नहीं रहती!
बहुत
संभाल के करना मदद ‘अल्फ़ाज़’ लोगों की,
भलाई
बे-वजह की आजकल अच्छी नहीं रहती!
|||अल्फ़ाज़
|||
नाज़ुक
= कोमल, मृदु
क़ुदरतन=
स्वाभाविक रूप से
मसला
(मस’अला)=
विषय, समस्या,
महज़= केवल,
मात्र
बिला
शुब्हा= निश्चित रूप से
मक़सद= लक्ष्य,
कारण
बिला
वज्हा=
अकारण
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