क़तरा वो स्याही सा क़ाग़ज़ पर रह गया,
अश्क़ों की स्याही से अशआर कह गया...
फिर से जो खंगाली दास्तान अपनी,
एक लम्हा आँखों के साहिल से बह गया...
एक झूठी हक़ीकत, एक बिसरी कहानी,
एक आरज़ू ख़्वाब में वो फिर से दे गया...
ये क्या दीवानगी, कि अब भी मुस्कुराता है,
तन्हाइयों के ज़ख्म जो तन्हा ही सह गया...
ये मेरी फुरक़त कि तू नहीं हासिल,
वक़्त की रेत सा तू हाथों से बह गया...
मुझको भी हुनर अता हो अदाकारी का,
कैसे लिखूं की दूर तू किस तरह गया...
वक़्त की धूल है आइनों पर जम गई,
परछाईंया है मेरी, पर चेहरा न रह गया...
जो था मेरी हक़ीकत, ख़ुद ख़्वाब हो गया,
जाने वाले तू ये क्या ताबीर कह गया...
जाने वाले तू ये क्या ताबीर कह गया...
Waah bhai waah lafzo ko is tarah se dil me utarte hue pahle kabhi mahsus nahi kiya maine
जवाब देंहटाएंWaah bhai waah lafzo ko is tarah se dil me utarte hue pahle kabhi mahsus nahi kiya maine
जवाब देंहटाएंshukriya bhai...abhi bahot kuchh aana baaki hai
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