तू
जीता क्यूँ गुज़रे कल में है,
ज़िन्दगी तो बस इस पल में है !
नज़र बा-अदब ये सोच के झुक जाती है,
कि उसकी इज़्ज़त भी छुपी आँचल में है !
दो किरदार किस तरह वो जी लेता है,
ज़बां पे यारी, छुरी
उसकी बग़ल में है !
चलो मिलें हम फ़िर से अजनबी बन कर,
अधूरेपन सा लुत्फ़ कहाँ मुकम्मल में है !
नशा भी किरदार के मुताबिक़ होता है,
सच की एक दवा भी इस बोतल में है !
तन्हाई भी मुकम्मल मयस्सर नहीं होती,
जिस्म तो एक जिस्मों के जंगल में है !
यूँ तो हर मौत का लम्हा मुक़र्रर है,
जी ले कि ज़िन्दगी तो हर एक पल में है
यक़ीन कर कि ना-मुमकिन कुछ भी नहीं,
'फ़राज़' मुश्किल तो महज़ पहल में है !
||| फ़राज़ |||
बा-अदब= Respectfully, With Due Respect.
इज़्ज़त= Respect, Esteem, Honor, Glory
किरदार= Character
ज़बां= Tongue, Speech
बग़ल= Armpit, Side
लुत्फ़= Pleasure, Enjoyment
मुकम्मल= Complete, Perfect
मुताबिक़= Like, Suitable, In Accordance
तन्हाई= Loneliness, Solitude
मयस्सर= Available
मुक़र्रर= Fixed
यक़ीन= Certainty, Truth, Confidence, Trust
ना-मुमकिन= Impossible
मुश्किल= Difficulty
महज़= Only, Merely
पहल= Beginning, First Initiative.