शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

सफ़र...

देखते हैं सफ़र किस ठिकाने चले,

आज अपना पता हम लगाने चले!

हम तलातुम की नज़रों में चुभने लगे,
दो किनारों को जब भी मिलाने चले!

अपनी जुर्अत को हम आज़माने चले,
आईने से निगाहें मिलाने चले!

जाने कितने ही सच हमने झुठला दिये,
झूठ जब एक ज़रा सा छुपाने चले!

कैसे कैसे न हमपे निशाने चले,
आज हम जो ज़रा मुस्कुराने चले!

आज फिर नए सिरे से वो याद आ गया,
आज फिर नए सिरे से भुलाने चले!

हाथ अक्सर जलाकर चले आए हैं,
आग बस्ती की जब भी बुझाने चले!

कितना बिकना पड़ेगा, पता चल गया,
आज ‘अल्फ़ाज़’ रोटी कमाने चले!
lll अल्फ़ाज़ lll

तलातुम = तूफ़ान, Tumlet
जुर्अत = दुःसाहस, Courage, Valour 

शनिवार, 27 अगस्त 2022

अक्स...

अक्स मेरा नहीं ये कोई ग़ैर है,
इसलिए आईने से हमें बैर है!

ज़िन्दगी के मुताल्लिक़ न कुछ पूछिए,
ठीक कुछ भी नहीं, और सब ख़ैर है!

वक़्त तो वक़्त है, फिर बदल जाएगा,
तू नज़ाकत समझ, वक़्त का फेर है!

बीच में पिस गई सारी इंसानियत,
एक तरफ है हरम, एक तरफ दैर है!

सिक्के के दोनों पहलू समझ आ गए,
आज जाकर मुकम्मल हुआ शेर है!

बोझ इतना भी ले कर के मत घूमिये,
ये जो दुनिया है ‘अल्फ़ाज़’ एक सैर है!
।।। अल्फ़ाज़।।।

अक्स = प्रतिबिंब, Reflection 
ग़ैर = अजनबी, दूसरा, Other, Stranger
बैर = विरोध, शत्रुता, Animity
मुताल्लिक़ = सम्बन्ध में, विषय में, Belonging, Relating (to)
ख़ैर = कुशल, मंगल, Well, Good
नज़ाकत = कोमलता, Delicacy
हरम = मस्जिद, Mosque 
दैर = मंदिर, Temple
मुकम्मल = पूर्ण, पूरा, Complete.




शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

इंसान


मुश्किल में न पड़ें हम,आसान ही रहें,

क्यूँ न कि आप और हम इंसान ही रहें!

 

संजीदगी से जीने को उम्र है पड़ी,

बच्चे हैं तो ज़रा से शैतान ही रहें!

 

आई हैं पेश ऐसी कड़वी हक़ीक़तें,

इम्कान या ख़ुदारा इम्कान ही रहें!

 

अल्लाह तू भले ही नादान हमको रख,

आधे-अधूरे सच से अन्जान ही रहें!

 

‘अल्फ़ाज़’ है ज़रूरी थोड़ा अधूरापन,

अरमान कुछ हमेशा अरमान ही रहें!

।।। अल्फ़ाज़ ।।।

 

संजीदगी = Seriousness, गंभीरता 

शैतान = Naughty, शरारती

पेश = Happen, समक्ष

हक़ीक़त = Reality, वास्तविकता

इम्कान = Possibility, Probability, अंदेशा, शंका

या ख़ुदारा = O God

नादान = Innocent, Ignorant, अज्ञानी

अरमान = Desire, Longing, इच्छा, लालसा

मंगलवार, 28 जून 2022

अंजुमन


अंजुमन में हमारी वो मेहमान हैं,

आज हमको क़यामत का इम्कान है!

 

सबने अपनी मोहब्बत की बातें करीं,

और मेरा कहीं और पर ध्यान है!

 

आग फिर से वही दिल में मेरे लगे,

एक बुझता हुआ दिल में अरमान है!

 

क्यूँ न इंसान बनकर ही हम तुम मिलें,

न मैं अल्लाह हूँ, न तू भगवान है!

दिल से बेहतर गवाही भला कौन है,

दिल से बेहतर भला कौन मीज़ान है!

 

दोस्तों की तरह भूल जाते नहीं,

दुश्मनों का बड़ा हमपे अहसान है!

 

वक़्त पड़ने से पहले वहम था हमें,

इस शहर में हमारी भी पहचान है!

 

नज़्म ‘अल्फ़ाज़’ की आज के दौर में,

बंद घर में खुला एक दालान है!

||| अल्फ़ाज़ |||

 

अंजुमन = सभा, Meeting, Assembly

अरमान = लालसा, इच्छा, Longing, Desire

इम्कान संभावना, Possiblity, Probability

मीज़ान = तुला, तराज़ू, Weigher, Balence

दालान =  बैठक, ओसारा, Open Hall, Vestibule

शनिवार, 4 जून 2022

क़ाइदा

 

आज़मा करके ख़ुद को ज़रा देखिए,

इंतिहा की कोई इंतिहा देखिए!

 

ख़ुद को पहचान शायद नहीं पाएँगे,

ख़ुद को बनके कोई दूसरा देखिए!

 

मेरे दुश्मन भी सुनकर के हैरान हैं,

मुझपे अपनों का वो तब्सिरा देखिए!

 

आज मक़तूल को ही सुना दी सज़ा,

मेरे हाकिम का ये फ़ैसला देखिए!

 

फ़ाइदा जिससे हो, बस उसी से मिलो,

इस शहर का नया क़ाइदा देखिए!

 

ज़िन्दगी की हक़ीक़त समझ जाएँगे,

आप पानी का एक बुलबुला देखिए!

 

ये ग़ज़ल नहीं बचपना है मेरा,

मेरी धुन में मुझे खेलता देखिए!

 

सबको अपनी तरह न समझ लीजिए,

थोड़ा ‘अल्फ़ाज़’ अच्छा-बुरा देखिए!

||| अल्फ़ाज़ |||


इंतिहा = हद, सीमा, Limit

तब्सिरा = टिपण्णी, Comment, Review

मक़तूल = मृतक, Dead

फ़ाइदा = लाभ, Profit

क़ाइदा = ढंग, रीति, Manner


मंगलवार, 24 मई 2022

तरक़्क़ी

 

सहारे छोड़ कर सारे चलो ख़ुद ही सँभलते हैं,

चलो हम आज अपने आप से बाहर निकलते हैं!

 

मेरी बेरोज़गारी को तरक़्क़ी मुँह चिढ़ाती है,

मिलों में काम अब इंसान का रोबोट करते हैं!

 

बहुत नज़दीकियाँ दूरी की वज्हा बन नहीं जाएँ,

मोहब्बत के अलावा भी चलो कुछ काम करते हैं!

 

यही एहसान उनका कम है क्या मेरी मसर्रत को,

मेरी ख़ातिर नहीं लेकिन गली से तो गुज़रते हैं!

 

जहाँ फ़रमाइशें कहने से पहले पूरी हो जाएँ,

उसी घर में ही अक्सर दोस्तों बच्चे बिगड़ते हैं!

 

ये कैसा ज़िन्दगी का दौर है जिसमे क़दम मेरे,

जहाँ से रोज़ चलते हैं, वहीं आकर ठहरते हैं!

 

अलग तरहा से आए हैं मेरे सूबे में अच्छे दिन,

जो पहले जुर्म करते थे, वो अब इंसाफ़ करते हैं!

 

मदद की पेशकश करने से बस ‘अल्फ़ाज़’ डरते हैं,

वो मेरे हाल पर वैसे बड़ा अफ़सोस करते हैं!

||| अल्फ़ाज़ |||


बेरोज़गारी = Unemployment

तरक़्क़ी = Progress, Development, विकास

मिल = Factory, कारख़ाना

नज़दीकी = Closeness, Intimacy, Proximity, घनिष्ठ्ता, निकटता

वज्हा  = Cause, Reason, कारण

मसर्रत = Happiness, प्रसन्नता, ख़ुशी

ख़ातिर = For The Sake Of.

फ़रमाइश = फ़रमाइशOrder For Goods, Will, Request, Pleasure, इच्छा

सूबा = Province, प्रदेश

जुर्म = Crime, अपराध

इंसाफ़ = Justice, न्याय

पेशकश =  Offer, प्रस्ताव

अफ़सोस = , विलाप, दुःख/शोक प्रकट करना

मंगलवार, 17 मई 2022

ढूँढते रह गए!

 

चैन खोया हुआ ढूँढते रह गए,

उम्र भर बचपना ढूँढते रह गए!

 

ज़िन्दगी हमको जी के चली भी गयी,

ज़िन्दगी का पता ढूँढते रह गए!

 

गाँव का घर हमे ढूँढता रह गया,

हम शहर में मकाँ ढूँढते रह गए!

 

दोस्तों ने कुछ ऐसे तजरबे दिए,

दुश्मनों में वफ़ा ढूँढते रह गए!

 

मौत आई तो हिकमत न कोई चली,

ज़िन्दगी भर दवा ढूँढते रह गए!

 

उस तरफ़ कोई आग बाक़ी न थी,

जिस तरफ़ हम धुआँ ढूँढते रह गए!

 

ठोकरों के सिवा और कुछ न मिला,

पत्थरों में खुदा ढूँढते रह गए!

 

तुमने इंसाँ को इन्सान समझा नहीं,

इसलिए तुम ख़ुदा ढूँढते रह गए!

 

मैं ख़यालों को ‘अल्फ़ाज़’ देता रहा,

लोग बस क़ाफ़िया ढूँढते रह गए!

||| अल्फ़ाज़|||


मकाँ =House, निवास

तजरबे = Experiences, अनुभव

वफ़ा = Fulfilment, Fidelity, Faithful

हिकमत = Cure, Medicare, उपचार

इंसाँ =  Human Being, Mankind, मनुष्य

क़ाफ़िया= Rhyme, The Last Or Second Last Words Of Each Verse Is Called Qafiya, तुकांत

बुधवार, 11 मई 2022

एक अधूरी मुलाक़ात

 

एक अधूरी मुलाक़ात की बात है,

अनकहे से सवालात की बात है!

 

फ़र्क पड़ता नहीं, जीत हो हार हो,

तुमने शह दी, यही मात की बात है!

 

ग़ैर के तो गिले यार से कर लिए,

किससे शिक़वा करें यार की बात है!

 

बात आई तो तुम बात से मुड़ गए,

तुम तो कहते थे कि बात की बात है!

 

वक़्त देते थे सब जब मेरा वक़्त था,

वक़्त देते नहीं, वक़्त की बात है!

 

जाने क्या सोच कर हम नहीं रो सके,

यूँ तो दिल टूटना रंज की बात है!

 

माना मेरे मुक़ाबिल हैं अपने मेरे,

कैसे पीछे हटूँ, फ़र्ज़ की बात है!

 

जब ग़ज़ल वो कहे ध्यान से तुम सुनो,

बात ‘अल्फ़ाज़’ की काम की बात है!


मुलाक़ात = Meeting, भेंट,

अनकहे = Untold

सवालात = Questions, प्रश्न   

फ़र्क = Difference, अन्तर

शह = Check

मात = Mate

गिले = Complaint, Lamentation, 

शिक़वा = Complaint, Lamentation, 

रंज = Grief, दुःख

मुक़ाबिल = Against, विरुद्ध

फ़र्ज़= Duty, Responsibility, कर्तव्य

शनिवार, 7 मई 2022

मसाइल

 

ज़िन्दगी के मसाइल खड़े हो गए,

सोचते हैं क्यूँ आख़िर बड़े हो गए!

 

ज़िम्मेदारी ने जेबें मेरी काट लीं,

ख़्वाब बटुए से मेरे बड़े हो गए!

 

देखना अबकी मैं भी बदल जाऊँगा,

साल कितने यही सोचते हो गए!

 

हैं बुरे जो महज़ जुर्म करते रहे,

जो सियासत में आए, भले हो गए!

 

दोस्ती जब किताबों से मैंने करी,

मेरे घर में कई आईने हो गए!

 

बात सच्ची जो हमने कही एक दिन,

जितने अच्छे थे, उतने बुरे हो गए!

 

मोड़ आया तो ‘अल्फ़ाज़’ ऐसा हुआ,

अपने-अपने सभी रास्ते हो गए!


मसाइल = मस’अले, विषय, समस्याएँ, Problems Subjects, Matters

बटुए = Wallet, Purse

महज़ = Merely, Only, केवल, मात्र

जुर्म = अपराध, Crime

सियासत = राजनीति, Politics

शनिवार, 30 अप्रैल 2022

ईद

 

ईद का चाँद तो है फ़लक पे मगर,

तेरा दीदार न हो तो क्या ईद है!

 

जिसने रमज़ान भर हमसे पर्दा किया,

वो नुमूदार न हो तो क्या ईद है!

 

लाख रुपयों से बटुआ भरा हो मगर,

दोस्त और यार न हो तो क्या ईद है!

 

हीरे-मोती लगे हों लिबासों में पर,

साथ परिवार न हो तो क्या ईद है!

 

जिनको कपड़े मिले हों नए न कभी,

उनका सिंगार न हो तो क्या ईद है!

 

जश्न कितना भी सारे ज़माने में हो,

दिल में त्यौहार न हो तो क्या ईद है!

 

मेरे घर में भला ईद कैसे मने,

मुल्क में प्यार न हो तो क्या ईद है!

 

एक तकलीफ़ अल्फ़ाज़ये भी तो है,

अपनी सरकार न हो तो क्या ईद है!


||| अल्फ़ाज़ |||

फ़लक = आसमान, Sky

नमूदार = प्रकट, प्रत्यक्ष,  Apparent, Visible,

लिबास = परिधान, पहनावा, Dress, Apparel

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

हाज़िरी

 

हंसती आँखों में ग़म की नमी आ गई,

लो बिछड़ने कि आख़िर घड़ी आ गयी!

 

यूँ तो कुछ भी मेरा वो नहीं ले गया,

उसके जाने से फिर भी कमी आ गयी!

 

जब भी संभले क़दम मस्जिदों में गए,

जब भी बहके तुम्हारी गली आ गयी!

 

उसको ख़ुश देख कर मैं सबर कर गया,

मेरे आड़े मेरी ही ख़ुशी आ गयी!

 

ज़िन्दगी दूर ज़्यादा तो मुझसे न थी,

मैंने आवाज़ दी, दौड़ती आ गई!

 

इससे बेहतर कोई सिलसिला न हुआ,

प्यार बन करके जब दोस्ती आ गई!

 

चूर तूफ़ाँ का सारा गुमाँ हो गया,

नाव साहिल पे जब काग़ज़ी आ गयी!

 

लफ़्ज़ ख़ुद ही कलम से निकलने लगे,

मुझपे अल्फ़ाज़की हाज़िरी आ गई!

||| अल्फ़ाज़ |||

गुमाँ = भ्रम,  Fancy, Doubt, Suspicion

हाज़िरी = उपस्थिति,  Presence, Attendance

गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

शायरी

मेरे दिल को जो ग़म की ख़बर हो गई,

शायरी किस क़दर बा-हुनर हो गई!

 

हम तेरे इश्क़ में मुब्तला यूँ हुए,

लोग कहते हैं हमको नज़र हो गई!

 

अर्श क्या, अब लबों तक पहुँचती नहीं,

कितनी मेरी दुआ बे-असर हो गई!

 

रात कैसे कटेगी तुम्हारे बिना,

सोचते-सोचते फिर सहर हो गई!

 

रूप उसका हमें तेरे जैसा लगा,

आग पानी में जब तर-ब-तर हो गई!

 

इस ख़ुशी से कहीं मर ही जाएँ न हम,

आज उनको हमारी फ़िकर हो गई!

 

अब ज़रा में तबीयत बिगड़ जाती है,

लग रहा है हमारी उमर हो गई!

 

मेरे लहजे में तल्ख़ी ज़माने की थी,

मुझको ‘अल्फ़ाज़’ कैसे शकर हो गई!

||| अल्फ़ाज़ |||

 

बा-हुनर = प्रतिभावान, Talented

अर्श =आसमान, Sky

मुब्तला = ग्रस्त, Infest

सहर = प्रातःकाल, सवेरा, Morning

तर-ब-तर = सराबोर, Dranch

लहजा = भाव, Tone

तल्ख़ी = कड़वाहट, Bitterness

शकर = मधुमेह, Diabetes