हक़ माँगने की छूट इस सरकार में नहीं,
सुनो
ख़बर जो आज के अख़बार में नहीं !
रखता
है पड़ोसी की ख़बर कौन आजकल,
अब
खिड़कियाँ पड़ोस की दीवार में नहीं !
होने
लगी है अब तो तिजारत ज़मीर की,
ईमानदारी
आजकल बाज़ार में नहीं !
यारों
ने जो दिया मुझे वो बे-ग़रज़ दिया,
यारी
में जो सुकून है वो प्यार में नहीं !
फ़िर
बीत गया जैसे कभी आया ही न था,
फ़ुर्सत का एक पल भी अब इतवार में नहीं !
वो
हँस दिए तो घुल गई फ़ज़ा में मौसिक़ी,
ऐसी
छनक पायल की भी झंकार में नहीं !
नख़रा-ओ-नाज़, हुस्न, झिझक, शर्म-ओ-हया,
है
कौन सी अदा जो मेरे यार में नहीं !
खोना
है अगर चैन तो फ़िर दिल लगाइए,
है
जो मज़ा तड़प में वो क़रार में नहीं !
'अल्फ़ाज़' अपने हुनर को पहचान तो सही,
जो
मार है कलम में वो हथियार में नहीं !
||| अल्फ़ाज़ |||
हक़ (Haq) = Right
तिजारत
(Tijarat) = Trade, Business
ज़मीर (Zameer) = Conscience
बे-ग़रज़ (Be-Garaz) = Selfless,
Without Any Interest
सुकून (Sukoon) = Peace, Rest, Tranquility
फ़ुर्सत (Fursat) = Leisure,
Freedom,
फ़ज़ा (Fazaa) = Width,
Spaciousness, Extensiveness
मौसिक़ी (Mausiqi) = Music
नखरा-ओ-नाज़ (Nakhra-O-Naaz) = Tantrum
And Pride/Grace
हुस्न (Husn) = Beauty,
Elegance, Comeliness
झिझक (Jhijhak) = Hesitation
शर्म-ओ-हया (Sharm-O-Haya) = Bashfulness, Shyness
क़रार (Qaraar) = Ease/Agreement
/ Tranquility