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शनिवार, 10 मार्च 2018

सौदा-ए-नाकाम !!!

ज़िन्दगी को ज़िन्दगी की इंतिहा चाहिए,
कि दर्द भी चाहिए तो बे-पनाह चाहिए !

एक राज़ को तलब होती है लब-कुशाई की,
एक रंज को भी अब अपनी ज़ुबां चाहिए !

शहर-बाज़ार में सुकून क्यूँ नहीं मिलता,
मुझे ग़म-ए-हयात की शिफ़ा चाहिए !

इश्क़ तजुर्बा है तो चलो करके देखें,
इश्क़ इल्ज़ाम है तो हर दफ़ा चाहिए !

कोई नुक्सान न हुआ मुझको बेग़रज़ होकर,
और तुझे तो दोस्ती में भी नफ़ा चाहिए !

कुछ दोस्तों की वजह से है ये हाल  मेरा,
कि अब मुझे दुश्मनों से मशवरा चाहिए !

ये ज़माना मुनाफ़े में है ख़ुदग़र्ज़ी करके,
मुझे भी अब अपनी ज़ात से नफ़ा चाहिए !

न बतलाओ मुझको किसी इमारत का पता,
मुझे तो अपने दिल में ख़ुदा चाहिए !

न दर्द चाहिए, न अब कोई दवा चाहिए,
अब तो सौदा-ए-नाकाम का नफ़ा चाहिए !

शरीफ़ों की शराफ़त से बख़ूबी वाक़िफ़ हूँ,
'फ़राज़' मुझे अपने जैसा कोई बुरा चाहिए !

||| फ़राज़ ||| 

इंतिहा= utmost limit, end, extremity
बे-पनाह= Limitless, Unending.
राज़= Secret
तलब= demand, desire,
लब-कुशाई= lip-opening, Speech
रंज= Grief, Sorrow.
ज़ुबां= Tongue, Speech
शहर-बाज़ार= City Market
सुकून= Peace
ग़म-ए-हयात= sorrows of life
तजुर्बा= Experience
इल्ज़ाम= Blame, Accusation.
दफ़ा= Time
बेग़रज़= Selfless
मशवरा= Counsel, Advice
ज़माना= the world/ era
मुनाफ़ा= Profit
ख़ुदग़र्ज़ी= Selfishness
ज़ात= Self.
नफ़ा= Profit
इमारत= Building
सौदा-ए-नाकाम= Unsuccessful/Lost deal.
शरीफ़= Gentle, Noble, Eminent
शराफ़त= Nobility, Civility, Gentle Manners.
बख़ूबी= Thoroughly
वाक़िफ़= Aware, Informed, Acquainted.