ईद का चाँद तो है फ़लक पे मगर,
तेरा दीदार न हो तो क्या ईद है!
जिसने रमज़ान भर हमसे पर्दा किया,
वो नुमूदार न हो तो क्या ईद है!
लाख रुपयों से बटुआ भरा हो मगर,
दोस्त और यार न हो तो क्या ईद है!
हीरे-मोती लगे हों लिबासों में पर,
साथ परिवार न हो तो क्या ईद है!
जिनको कपड़े मिले हों नए न कभी,
उनका सिंगार न हो तो क्या ईद है!
जश्न कितना भी सारे ज़माने में हो,
दिल में त्यौहार न हो तो क्या ईद है!
मेरे घर में भला ईद कैसे मने,
मुल्क में प्यार न हो तो क्या ईद है!
एक तकलीफ़ ‘अल्फ़ाज़’ ये भी तो है,
अपनी सरकार न हो तो क्या ईद है!
||| अल्फ़ाज़ |||
फ़लक
=
आसमान, Sky
नमूदार = प्रकट,
प्रत्यक्ष, Apparent, Visible,
लिबास
=
परिधान, पहनावा, Dress, Apparel