गुरुवार, 6 अप्रैल 2023

स्याह उजाले...


सच के रस्ते चलने वाले पैरों में छाले मिलते हैं,

इस धूप की नगरी में हमको कुछ स्याह उजाले मिलते हैं!

 

एक वक़्त था जब घर की बेटी सारे गाँव की बेटी थी,

अब दूध-मुँही की इज़्ज़त को भी लूटने वाले मिलते हैं!

 

वो क्या जानें, हम भूखों को क्यूँ चाँद में रोटी दिखती है,

जिनको घर बैठे थाली में भर पेट निवाले मिलते हैं!

 

न टोपी, न ही लाल तिलक, न पगड़ी पहन के आया हूँ,

कुछ लोग मुझे क्यूँ बस्ती में तलवार निकाले मिलते हैं!

 

भगवान तो छोड़ो लोगों में इंसान भी अब कम मिलता है,

हाँ, वैसे तो इस नगरी में हर मोड़ शिवाले मिलते हैं!

 

कुछ काम पड़े तो मिलता है, बस काम की बातें करता है,

अब वो मिलता है ऐसे जैसे दुनिया वाले मिलते हैं!

 

कोहसार हों, दरिया-सागर हों, रस्ता आख़िर बन जाता है,

चाहे कुछ हो जाए लेकिन मिलने वाले मिलते हैं!

 

अब कौन भला हमको पढ़के हर रात सरहाने रखता है,

अब तो टूटी अलमारी में उर्दू के रिसाले मिलते हैं!

 

क्यूँ भीड़ यहाँ पर इतनी है, ‘अल्फ़ाज़’ पता कर आया है,

इन बाज़ारों में फ़ित्नों के तैयार मसाले मिलते हैं!

||| अल्फ़ाज़ |||


स्याह = काला, Black

कोहसार = पर्वतमाला, Range of Mountains

सिरहाना = Near Head

रिसाला = पत्रिका, Magazine

फ़ित्ना = बुराई, पाप, evil, sin

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