मंगलवार, 24 मई 2022

तरक़्क़ी

 

सहारे छोड़ कर सारे चलो ख़ुद ही सँभलते हैं,

चलो हम आज अपने आप से बाहर निकलते हैं!

 

मेरी बेरोज़गारी को तरक़्क़ी मुँह चिढ़ाती है,

मिलों में काम अब इंसान का रोबोट करते हैं!

 

बहुत नज़दीकियाँ दूरी की वज्हा बन नहीं जाएँ,

मोहब्बत के अलावा भी चलो कुछ काम करते हैं!

 

यही एहसान उनका कम है क्या मेरी मसर्रत को,

मेरी ख़ातिर नहीं लेकिन गली से तो गुज़रते हैं!

 

जहाँ फ़रमाइशें कहने से पहले पूरी हो जाएँ,

उसी घर में ही अक्सर दोस्तों बच्चे बिगड़ते हैं!

 

ये कैसा ज़िन्दगी का दौर है जिसमे क़दम मेरे,

जहाँ से रोज़ चलते हैं, वहीं आकर ठहरते हैं!

 

अलग तरहा से आए हैं मेरे सूबे में अच्छे दिन,

जो पहले जुर्म करते थे, वो अब इंसाफ़ करते हैं!

 

मदद की पेशकश करने से बस ‘अल्फ़ाज़’ डरते हैं,

वो मेरे हाल पर वैसे बड़ा अफ़सोस करते हैं!

||| अल्फ़ाज़ |||


बेरोज़गारी = Unemployment

तरक़्क़ी = Progress, Development, विकास

मिल = Factory, कारख़ाना

नज़दीकी = Closeness, Intimacy, Proximity, घनिष्ठ्ता, निकटता

वज्हा  = Cause, Reason, कारण

मसर्रत = Happiness, प्रसन्नता, ख़ुशी

ख़ातिर = For The Sake Of.

फ़रमाइश = फ़रमाइशOrder For Goods, Will, Request, Pleasure, इच्छा

सूबा = Province, प्रदेश

जुर्म = Crime, अपराध

इंसाफ़ = Justice, न्याय

पेशकश =  Offer, प्रस्ताव

अफ़सोस = , विलाप, दुःख/शोक प्रकट करना

मंगलवार, 17 मई 2022

ढूँढते रह गए!

 

चैन खोया हुआ ढूँढते रह गए,

उम्र भर बचपना ढूँढते रह गए!

 

ज़िन्दगी हमको जी के चली भी गयी,

ज़िन्दगी का पता ढूँढते रह गए!

 

गाँव का घर हमे ढूँढता रह गया,

हम शहर में मकाँ ढूँढते रह गए!

 

दोस्तों ने कुछ ऐसे तजरबे दिए,

दुश्मनों में वफ़ा ढूँढते रह गए!

 

मौत आई तो हिकमत न कोई चली,

ज़िन्दगी भर दवा ढूँढते रह गए!

 

उस तरफ़ कोई आग बाक़ी न थी,

जिस तरफ़ हम धुआँ ढूँढते रह गए!

 

ठोकरों के सिवा और कुछ न मिला,

पत्थरों में खुदा ढूँढते रह गए!

 

तुमने इंसाँ को इन्सान समझा नहीं,

इसलिए तुम ख़ुदा ढूँढते रह गए!

 

मैं ख़यालों को ‘अल्फ़ाज़’ देता रहा,

लोग बस क़ाफ़िया ढूँढते रह गए!

||| अल्फ़ाज़|||


मकाँ =House, निवास

तजरबे = Experiences, अनुभव

वफ़ा = Fulfilment, Fidelity, Faithful

हिकमत = Cure, Medicare, उपचार

इंसाँ =  Human Being, Mankind, मनुष्य

क़ाफ़िया= Rhyme, The Last Or Second Last Words Of Each Verse Is Called Qafiya, तुकांत

बुधवार, 11 मई 2022

एक अधूरी मुलाक़ात

 

एक अधूरी मुलाक़ात की बात है,

अनकहे से सवालात की बात है!

 

फ़र्क पड़ता नहीं, जीत हो हार हो,

तुमने शह दी, यही मात की बात है!

 

ग़ैर के तो गिले यार से कर लिए,

किससे शिक़वा करें यार की बात है!

 

बात आई तो तुम बात से मुड़ गए,

तुम तो कहते थे कि बात की बात है!

 

वक़्त देते थे सब जब मेरा वक़्त था,

वक़्त देते नहीं, वक़्त की बात है!

 

जाने क्या सोच कर हम नहीं रो सके,

यूँ तो दिल टूटना रंज की बात है!

 

माना मेरे मुक़ाबिल हैं अपने मेरे,

कैसे पीछे हटूँ, फ़र्ज़ की बात है!

 

जब ग़ज़ल वो कहे ध्यान से तुम सुनो,

बात ‘अल्फ़ाज़’ की काम की बात है!


मुलाक़ात = Meeting, भेंट,

अनकहे = Untold

सवालात = Questions, प्रश्न   

फ़र्क = Difference, अन्तर

शह = Check

मात = Mate

गिले = Complaint, Lamentation, 

शिक़वा = Complaint, Lamentation, 

रंज = Grief, दुःख

मुक़ाबिल = Against, विरुद्ध

फ़र्ज़= Duty, Responsibility, कर्तव्य

शनिवार, 7 मई 2022

मसाइल

 

ज़िन्दगी के मसाइल खड़े हो गए,

सोचते हैं क्यूँ आख़िर बड़े हो गए!

 

ज़िम्मेदारी ने जेबें मेरी काट लीं,

ख़्वाब बटुए से मेरे बड़े हो गए!

 

देखना अबकी मैं भी बदल जाऊँगा,

साल कितने यही सोचते हो गए!

 

हैं बुरे जो महज़ जुर्म करते रहे,

जो सियासत में आए, भले हो गए!

 

दोस्ती जब किताबों से मैंने करी,

मेरे घर में कई आईने हो गए!

 

बात सच्ची जो हमने कही एक दिन,

जितने अच्छे थे, उतने बुरे हो गए!

 

मोड़ आया तो ‘अल्फ़ाज़’ ऐसा हुआ,

अपने-अपने सभी रास्ते हो गए!


मसाइल = मस’अले, विषय, समस्याएँ, Problems Subjects, Matters

बटुए = Wallet, Purse

महज़ = Merely, Only, केवल, मात्र

जुर्म = अपराध, Crime

सियासत = राजनीति, Politics