गुरुवार, 10 नवंबर 2022

एहसास

सीने से तो वो लगा थादिल से लगा न था,

कुछ इस तरह मिला वो जैसे मिला न था!

 

किरदार को मैं उसके कैसे बुरा कहूँ,

दुश्मन तो वो मेरा थाइंसाँ बुरा न था!

 

तारीफ़ क्या करूँ मैं अहबाब की मेरे,

ऐसा कोई नहीं है जिसने ठगा न था!

 

फिर से वही इरादे, फिर से वही अहद,

नए साल के अलावा कुछ भी नया न था!

 

अन्जान जब तलक था रस्म-ओ-रिवाज से,

अच्छा तो मैं नहीं थाइतना बुरा न था!

 

उड़ने की जिसमे ज़िद थीआख़िर वो उड़ गया,

उड़ने से जो डरा थावो ही उड़ा न था!

 

जीना है चैन से तो ‘अल्फ़ाज़’ चुप रहो,

सच बोलना तो पहले इतना मना न था!

||| अल्फ़ाज़ |||


किरदार = Character, चरित्र

इंसाँ = Human Being, मनुष्य

अहबाब = Friends, मित्र, प्रियजन

अहद = Promise, Oath, प्रण, सौगंध

रस्म-ओ-रिवाज = Customs And Traditions, परंपरा

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2022

नश्तर...

आरज़ू है वही, जो मुक़द्दर नहीं,

क़ीमती वो लगा, जो मयस्सर नहीं!

 

जाने कब बढ़ गए पाँव इतने मेरे,

कोई चादर भी आती बराबर नहीं!

 

थोड़े-थोड़े हैं हैं सारे ही इंसाँ ग़लत,

राम तू है नहीं, मैं पयम्बर नहीं!

 

मस्जिदें भी दिवाली पे रौशन करो,

इन चराग़ों के मज़हब मुक़र्रर नहीं!

 

तू तो दरिया है तुझसे मेरा होगा क्या,

मुझको तर कर सका कोई सागर नहीं!

 

बस उसी एक मंज़िल की ज़िद है मुझे,

जिस तलक जा सका कोई रहबर नहीं!

 

पर कटे हैं मगर पार हो जाऊँगा,

हौसले से बड़ा तो समंदर नहीं!

 

सौ दफ़ा सोचकर एक दफ़ा बोलिए,

क्यूंकि ‘अल्फ़ाज़’ सा कोई नश्तर नहीं!

||| अल्फ़ाज़ |||


आरज़ू = इच्छा, चाहत, Wish, Desire

कीमती = मूल्यवान, Precious, Expensive

मयस्सर = हासिल, प्राप्त, Available

रहबर = मार्गदर्शक, Guide

पयम्बर = ख़ुदा/ईश्वर का संदेशवाहक, Messenger Of God, Prophet.

चराग़ = दीपक, An Oil Lamp

मुक़र्रर = निश्चित, नियत,Imposed, Fixed,

नश्तर = छुरी, चाक़ू, cutter, lancet

बुधवार, 19 अक्टूबर 2022

तस्बिरा!!!

ग़लतियाँ फ़ितरतन देखते रह गए,
चाँद में भी गहन देखते रह गए!

 

हुस्न-ए-सीरत नहीं देख पाए मगर,
रंग-ओ-क़द-ओ-वज़न देखते रह गए!

 

मुफ़्लिसी की गली से जो गुज़रे कभी,
ज़िन्दगी के जतन देखते रह गए!

 

एक सौदाई को जब ख़ुदा मिल गया,
शैख़-ओ-बरहमन देखते रह गए!

 

सारे शोले जहाँ के इकट्ठे हुए,
मेरे दिल की जलन देखते रह गए!

 

तस्बिरा हमने फूलों पे कुछ यूँ किया,
कांटे मेरी चुभन देखते रह गए!

 

रावणों के बराबर में हो के खड़े,
लोग लंका-दहन देखते रह गए!

 

इश्क़ मीरा सा करना तो मुम्किन न था,
लोग राधा-किशन देखते रह गए!

 

जैसे शम्मा को ताके पतंगा कोई,
ऐसे हो के मगन देखते रह गए!

 

महफ़िलों में मुझे जो बुलाते ने थे,
वो मेरी अंजुमन देखते रह गए!

 

जब भी परदेस में याद आया वतन,
हर जगह हमवतन देखते रह गए!

 

उनको पीछे बहुत छोड़ आये हैं हम,
पाँव की जो थकन देखते रह गए!

 

मैंने अपने हुनर पे भरोसा किया,
लोग अच्छा शगन देखते रह गए!

 

मैंने ‘अल्फ़ाज़’ लिक्खी थीं सच्चाइयाँ,
लोग बह्र-ओ-वज़न देखते रह गए!

||| अल्फ़ाज़ |||

 

फ़ितरतन = Naturally, स्वभावतः

गहन = Eclipse. ग्रहण

सीरत = Nature, Character, स्वभाव, प्रकृति

तब्सिरा = Review, Criticism, आलोचना, समीक्षा

सौदाई = पागल, दीवाना, Crazy, Mad, Lovesick

शैख़ = इस्लाम धर्म का उपदेशक, A Muslim Preacher/Saint

बरहमन = ब्राह्मण, Brahmin,

शोला = FlameFireअंगारा

मुफ़्लिसी = Poverty, निर्धनता, ग़रीबी

जतन = Effort, Endeavour, प्रयत्न, प्रयास

हमवतन =  Compatriot, Fellow-Countryman, देशवासी

शगन = An Omen, An Augury, शगुन, महुर्त

बह्र= Poetic Metre, Rhythm, शायरी का मापक/मीटर! (छंद) नज़्म के उन्नीस स्थापित आहंगों या वज़नों में से हर एक जो शेर का वज़्न जानने और ठीक करने में काम आते हैं!

वज़न,(वज़्न)= Weight, Measure, Balance, शायरी/बात का भार/गहराई!, छंद/वृत्त/बह्र/काव्य पद के अक्षरों को गणों की मात्राओं से मिलाकर बराबर करना!

शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

सफ़र...

देखते हैं सफ़र किस ठिकाने चले,

आज अपना पता हम लगाने चले!

हम तलातुम की नज़रों में चुभने लगे,
दो किनारों को जब भी मिलाने चले!

अपनी जुर्अत को हम आज़माने चले,
आईने से निगाहें मिलाने चले!

जाने कितने ही सच हमने झुठला दिये,
झूठ जब एक ज़रा सा छुपाने चले!

कैसे कैसे न हमपे निशाने चले,
आज हम जो ज़रा मुस्कुराने चले!

आज फिर नए सिरे से वो याद आ गया,
आज फिर नए सिरे से भुलाने चले!

हाथ अक्सर जलाकर चले आए हैं,
आग बस्ती की जब भी बुझाने चले!

कितना बिकना पड़ेगा, पता चल गया,
आज ‘अल्फ़ाज़’ रोटी कमाने चले!
lll अल्फ़ाज़ lll

तलातुम = तूफ़ान, Tumlet
जुर्अत = दुःसाहस, Courage, Valour 

शनिवार, 27 अगस्त 2022

अक्स...

अक्स मेरा नहीं ये कोई ग़ैर है,
इसलिए आईने से हमें बैर है!

ज़िन्दगी के मुताल्लिक़ न कुछ पूछिए,
ठीक कुछ भी नहीं, और सब ख़ैर है!

वक़्त तो वक़्त है, फिर बदल जाएगा,
तू नज़ाकत समझ, वक़्त का फेर है!

बीच में पिस गई सारी इंसानियत,
एक तरफ है हरम, एक तरफ दैर है!

सिक्के के दोनों पहलू समझ आ गए,
आज जाकर मुकम्मल हुआ शेर है!

बोझ इतना भी ले कर के मत घूमिये,
ये जो दुनिया है ‘अल्फ़ाज़’ एक सैर है!
।।। अल्फ़ाज़।।।

अक्स = प्रतिबिंब, Reflection 
ग़ैर = अजनबी, दूसरा, Other, Stranger
बैर = विरोध, शत्रुता, Animity
मुताल्लिक़ = सम्बन्ध में, विषय में, Belonging, Relating (to)
ख़ैर = कुशल, मंगल, Well, Good
नज़ाकत = कोमलता, Delicacy
हरम = मस्जिद, Mosque 
दैर = मंदिर, Temple
मुकम्मल = पूर्ण, पूरा, Complete.




शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

इंसान


मुश्किल में न पड़ें हम,आसान ही रहें,

क्यूँ न कि आप और हम इंसान ही रहें!

 

संजीदगी से जीने को उम्र है पड़ी,

बच्चे हैं तो ज़रा से शैतान ही रहें!

 

आई हैं पेश ऐसी कड़वी हक़ीक़तें,

इम्कान या ख़ुदारा इम्कान ही रहें!

 

अल्लाह तू भले ही नादान हमको रख,

आधे-अधूरे सच से अन्जान ही रहें!

 

‘अल्फ़ाज़’ है ज़रूरी थोड़ा अधूरापन,

अरमान कुछ हमेशा अरमान ही रहें!

।।। अल्फ़ाज़ ।।।

 

संजीदगी = Seriousness, गंभीरता 

शैतान = Naughty, शरारती

पेश = Happen, समक्ष

हक़ीक़त = Reality, वास्तविकता

इम्कान = Possibility, Probability, अंदेशा, शंका

या ख़ुदारा = O God

नादान = Innocent, Ignorant, अज्ञानी

अरमान = Desire, Longing, इच्छा, लालसा

मंगलवार, 28 जून 2022

अंजुमन


अंजुमन में हमारी वो मेहमान हैं,

आज हमको क़यामत का इम्कान है!

 

सबने अपनी मोहब्बत की बातें करीं,

और मेरा कहीं और पर ध्यान है!

 

आग फिर से वही दिल में मेरे लगे,

एक बुझता हुआ दिल में अरमान है!

 

क्यूँ न इंसान बनकर ही हम तुम मिलें,

न मैं अल्लाह हूँ, न तू भगवान है!

दिल से बेहतर गवाही भला कौन है,

दिल से बेहतर भला कौन मीज़ान है!

 

दोस्तों की तरह भूल जाते नहीं,

दुश्मनों का बड़ा हमपे अहसान है!

 

वक़्त पड़ने से पहले वहम था हमें,

इस शहर में हमारी भी पहचान है!

 

नज़्म ‘अल्फ़ाज़’ की आज के दौर में,

बंद घर में खुला एक दालान है!

||| अल्फ़ाज़ |||

 

अंजुमन = सभा, Meeting, Assembly

अरमान = लालसा, इच्छा, Longing, Desire

इम्कान संभावना, Possiblity, Probability

मीज़ान = तुला, तराज़ू, Weigher, Balence

दालान =  बैठक, ओसारा, Open Hall, Vestibule

शनिवार, 4 जून 2022

क़ाइदा

 

आज़मा करके ख़ुद को ज़रा देखिए,

इंतिहा की कोई इंतिहा देखिए!

 

ख़ुद को पहचान शायद नहीं पाएँगे,

ख़ुद को बनके कोई दूसरा देखिए!

 

मेरे दुश्मन भी सुनकर के हैरान हैं,

मुझपे अपनों का वो तब्सिरा देखिए!

 

आज मक़तूल को ही सुना दी सज़ा,

मेरे हाकिम का ये फ़ैसला देखिए!

 

फ़ाइदा जिससे हो, बस उसी से मिलो,

इस शहर का नया क़ाइदा देखिए!

 

ज़िन्दगी की हक़ीक़त समझ जाएँगे,

आप पानी का एक बुलबुला देखिए!

 

ये ग़ज़ल नहीं बचपना है मेरा,

मेरी धुन में मुझे खेलता देखिए!

 

सबको अपनी तरह न समझ लीजिए,

थोड़ा ‘अल्फ़ाज़’ अच्छा-बुरा देखिए!

||| अल्फ़ाज़ |||


इंतिहा = हद, सीमा, Limit

तब्सिरा = टिपण्णी, Comment, Review

मक़तूल = मृतक, Dead

फ़ाइदा = लाभ, Profit

क़ाइदा = ढंग, रीति, Manner


मंगलवार, 24 मई 2022

तरक़्क़ी

 

सहारे छोड़ कर सारे चलो ख़ुद ही सँभलते हैं,

चलो हम आज अपने आप से बाहर निकलते हैं!

 

मेरी बेरोज़गारी को तरक़्क़ी मुँह चिढ़ाती है,

मिलों में काम अब इंसान का रोबोट करते हैं!

 

बहुत नज़दीकियाँ दूरी की वज्हा बन नहीं जाएँ,

मोहब्बत के अलावा भी चलो कुछ काम करते हैं!

 

यही एहसान उनका कम है क्या मेरी मसर्रत को,

मेरी ख़ातिर नहीं लेकिन गली से तो गुज़रते हैं!

 

जहाँ फ़रमाइशें कहने से पहले पूरी हो जाएँ,

उसी घर में ही अक्सर दोस्तों बच्चे बिगड़ते हैं!

 

ये कैसा ज़िन्दगी का दौर है जिसमे क़दम मेरे,

जहाँ से रोज़ चलते हैं, वहीं आकर ठहरते हैं!

 

अलग तरहा से आए हैं मेरे सूबे में अच्छे दिन,

जो पहले जुर्म करते थे, वो अब इंसाफ़ करते हैं!

 

मदद की पेशकश करने से बस ‘अल्फ़ाज़’ डरते हैं,

वो मेरे हाल पर वैसे बड़ा अफ़सोस करते हैं!

||| अल्फ़ाज़ |||


बेरोज़गारी = Unemployment

तरक़्क़ी = Progress, Development, विकास

मिल = Factory, कारख़ाना

नज़दीकी = Closeness, Intimacy, Proximity, घनिष्ठ्ता, निकटता

वज्हा  = Cause, Reason, कारण

मसर्रत = Happiness, प्रसन्नता, ख़ुशी

ख़ातिर = For The Sake Of.

फ़रमाइश = फ़रमाइशOrder For Goods, Will, Request, Pleasure, इच्छा

सूबा = Province, प्रदेश

जुर्म = Crime, अपराध

इंसाफ़ = Justice, न्याय

पेशकश =  Offer, प्रस्ताव

अफ़सोस = , विलाप, दुःख/शोक प्रकट करना

मंगलवार, 17 मई 2022

ढूँढते रह गए!

 

चैन खोया हुआ ढूँढते रह गए,

उम्र भर बचपना ढूँढते रह गए!

 

ज़िन्दगी हमको जी के चली भी गयी,

ज़िन्दगी का पता ढूँढते रह गए!

 

गाँव का घर हमे ढूँढता रह गया,

हम शहर में मकाँ ढूँढते रह गए!

 

दोस्तों ने कुछ ऐसे तजरबे दिए,

दुश्मनों में वफ़ा ढूँढते रह गए!

 

मौत आई तो हिकमत न कोई चली,

ज़िन्दगी भर दवा ढूँढते रह गए!

 

उस तरफ़ कोई आग बाक़ी न थी,

जिस तरफ़ हम धुआँ ढूँढते रह गए!

 

ठोकरों के सिवा और कुछ न मिला,

पत्थरों में खुदा ढूँढते रह गए!

 

तुमने इंसाँ को इन्सान समझा नहीं,

इसलिए तुम ख़ुदा ढूँढते रह गए!

 

मैं ख़यालों को ‘अल्फ़ाज़’ देता रहा,

लोग बस क़ाफ़िया ढूँढते रह गए!

||| अल्फ़ाज़|||


मकाँ =House, निवास

तजरबे = Experiences, अनुभव

वफ़ा = Fulfilment, Fidelity, Faithful

हिकमत = Cure, Medicare, उपचार

इंसाँ =  Human Being, Mankind, मनुष्य

क़ाफ़िया= Rhyme, The Last Or Second Last Words Of Each Verse Is Called Qafiya, तुकांत