आरज़ू
है वही, जो मुक़द्दर नहीं,
क़ीमती
वो लगा, जो मयस्सर नहीं!
जाने
कब बढ़ गए पाँव इतने मेरे,
कोई
चादर भी आती बराबर नहीं!
थोड़े-थोड़े
हैं हैं सारे ही इंसाँ ग़लत,
राम
तू है नहीं, मैं पयम्बर नहीं!
मस्जिदें
भी दिवाली पे रौशन करो,
इन
चराग़ों के मज़हब मुक़र्रर नहीं!
तू
तो दरिया है तुझसे मेरा होगा क्या,
मुझको
तर कर सका कोई सागर नहीं!
बस
उसी एक मंज़िल की ज़िद है मुझे,
जिस
तलक जा सका कोई रहबर नहीं!
पर
कटे हैं मगर पार हो जाऊँगा,
हौसले
से बड़ा तो समंदर नहीं!
सौ दफ़ा सोचकर एक दफ़ा बोलिए,
क्यूंकि ‘अल्फ़ाज़’ सा कोई नश्तर नहीं!
||| अल्फ़ाज़ |||
आरज़ू = इच्छा, चाहत, Wish, Desire
कीमती = मूल्यवान, Precious, Expensive
मयस्सर = हासिल, प्राप्त, Available
रहबर = मार्गदर्शक, Guide
पयम्बर =
ख़ुदा/ईश्वर का संदेशवाहक, Messenger Of God, Prophet.
चराग़ = दीपक, An Oil Lamp
मुक़र्रर = निश्चित, नियत,Imposed, Fixed,
नश्तर = छुरी, चाक़ू, cutter, lancet