ऐ शाम-ए-ग़म
कभी तू यूँ भी तो बन के आ,
कि तन्हाई तो
हो ‘फ़राज़’, ग़म-ए-यार न हो !
||| फ़राज़ |||
शाम-ए-ग़म(Shaam-e-Gham) = Evening of Sorrow
तन्हाई (Tanhai) = Solitude, Loneliness
ग़म-ए-यार= Sorrow of beloved.
जिंदगी दो तरह के सवालों में है एक जीते हैं हम, एक ख़यालों में है! चलिए रूबरू कराते हैं अल्फ़ाज़ की अल्फ़ाज़ियत से l मैं वादा करता हूँ कि मेरी हर ग़ज़ल में आप मुझसे, और ख़ुद से भी मिलेंगे l