हर दौर में सुनोगे फ़साना हुसैन का,
आलम हुसैन का है ज़माना हुसैन का!
ज़िन्दा है आज भी तो हर एक दिल में कर्बला,
क़िस्सा तो यूँ बहुत है पुराना हुसैन का!
इश्क़-ए-हुसैन जानिये इश्क़-ए-रसूल है,
मरकज़ है दीन का वो घराना हुसैन का!
मैं भी जियूँ अली सा और हुसैन सा मरुँ,
मैं आशिक़-ए-रसूल दीवाना हुसैन का!
कट जाए मगर सर न झुके ज़ुल्म के आगे,
लोहा यजीदियों ने भी माना हुसैन का!
है ग़म कोई तो ग़म है
ग़म-ए-हज़रत-ए-शब्बीर,
है ग़म कोई तो ग़म है मनाना
हुसैन का!
हर दौर में सुनोगे फ़साना
हुसैन का,
आलम हुसैन का है ज़माना
हुसैन का!
||| अल्फ़ाज़ |||